पूर्व साजिश साबित बिना साझा मंशा नहीं: 1985 हत्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को किया बरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 के तहत दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी के बीच पहले से कोई साझा योजना या साजिश थी। इस आधार पर अदालत ने 1985 के हत्या मामले में एक आरोपी को बरी किया।
जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 1989 में पारित सत्र अदालत का फैसला रद्द करते हुए कहा कि बिना “पूर्व सहमति या साजिश” (प्रायर कॉन्सर्ट) साबित किए धारा 34 लागू नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा,
“धारा 302 के साथ धारा 34 के तहत दोषसिद्धि के लिए यह जरूरी है कि ठोस साक्ष्य के आधार पर यह साबित हो कि आरोपी ने अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर अपराध करने की पूर्व योजना बनाई थी।”
मामला जून 1985 की एक घटना से जुड़ा था, जिसमें आरोप था कि मुख्य आरोपी बृजेन्द्र सिंह अपने साथी बृज राज सिंह के साथ मृतक के घर गया और गोली मारकर उसकी हत्या की। कहा गया कि दूसरे आरोपी ने उकसाने की भूमिका निभाई थी।
हालांकि, अपील के दौरान मुख्य आरोपी की मृत्यु हो गई, इसलिए अदालत ने केवल बचे हुए आरोपी के मामले पर विचार किया।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी ने गोली नहीं चलाई और उसे केवल “उकसाने” की औपचारिक भूमिका दी गई। साथ ही उसके खिलाफ कोई स्पष्ट मकसद या पूर्व साजिश का प्रमाण नहीं है।
अदालत ने पाया कि गवाह के बयान में ऐसा कोई ठोस संकेत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी के पास हत्या में शामिल होने का कोई उद्देश्य था। साथ ही यह भी साबित नहीं हो सका कि दोनों आरोपियों के बीच पहले से कोई योजना थी।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 34 के लिए पूर्व योजना और उसके अनुसार किया गया कृत्य साबित होना जरूरी है।
अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इन आवश्यक पहलुओं पर सही ढंग से विचार नहीं किया और केवल उपस्थिति के आधार पर आरोपी को दोषी ठहरा दिया।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी की भूमिका संदेहास्पद है और उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। इसलिए उसे बरी करते हुए सत्र अदालत का फैसला रद्द कर दिया गया।