जिला कोर्ट में व्यस्तता बताकर हाईकोर्ट से स्थगन मांगना पेशेवर दायित्वों के प्रति अनादर: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-24 06:58 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला कोर्ट में व्यस्तता का हवाला देकर मामलों में स्थगन मांगने की वकालत की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि इस तरह का आचरण न केवल पेशेवर दायित्वों के प्रति अनादर दर्शाता है, बल्कि हाईकोर्ट के प्रति भी सम्मान की कमी को प्रदर्शित करता है। इससे मामलों का लंबित रहना कृत्रिम रूप से बढ़ता है और न्याय वितरण की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) के तहत दायर आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं। मामले में अपीलकर्ता की ओर से स्थगन का अनुरोध किया गया। बताया गया कि नियुक्त तीन में से दो अधिवक्ता जिला अदालत में व्यस्त हैं।

अदालत ने पाया कि पिछली सुनवाई पर भी अपीलकर्ता की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ और मामला केवल आगे बढ़ा दिया गया था। इस बार भी तीनों अधिवक्ता अनुपस्थित रहे।

हाईकोर्ट ने कहा,

"जिला कोर्ट में व्यस्त होने का कारण बताकर नए मामले में बहस के लिए उपस्थित न होना वकीलों के पेशेवर दायित्वों और हाईकोर्ट के प्रति सम्मान की कमी को दर्शाता है।"

अदालत ने कहा कि न्याय वितरण की प्रक्रिया में वकीलों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन किसी मामले का निर्णय केवल वकीलों की सहायता पर निर्भर नहीं होता। यदि बिना किसी उचित कारण के वकील अदालत की सहायता नहीं करते हैं, तब भी अदालत का दायित्व है कि वह रिकॉर्ड के आधार पर मामले का निस्तारण करे।

इसी कारण अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन कर अपील पर सुनवाई की और उसे गुण-दोष के आधार पर खारिज किया।

फैसले में जस्टिस विद्यार्थी ने यह भी कहा कि हाल के समय में हाईकोर्ट के समक्ष बड़ी संख्या में ऐसे आवेदन आ रहे हैं, जिनमें जिला कोर्ट या अधिकरण में व्यस्तता का हवाला देकर स्थगन मांगा जाता है।

अदालत ने कहा कि परंपरागत रूप से वकील हाईकोर्ट में पेशी को अधीनस्थ अदालतों और अधिकरणों पर प्राथमिकता देते रहे हैं, लेकिन अब कुछ मामलों में जानबूझकर नए मामलों की सुनवाई से बचा जाता है, ताकि बिना सुनवाई के मामले लंबित बने रहें। इससे हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या कृत्रिम रूप से बढ़ती है।

अदालत ने यह भी कहा कि दूसरी ओर अधीनस्थ अदालतों में भी केवल यह कहकर बार-बार स्थगन लिया जाता है कि मामला हाईकोर्ट में लंबित है, जबकि कई मामलों में हाईकोर्ट की ओर से कोई अंतरिम आदेश भी नहीं होता। इससे मुकदमों के निस्तारण में अनावश्यक देरी होती है।

अंत में हाईकोर्ट ने वकीलों से अपील की कि वे न्यायालय के जिम्मेदार अधिकारी होने के अपने दायित्व को समझें, अदालत की प्रभावी सहायता करें और तुच्छ तथा अनुचित आधारों पर स्थगन मांगने से बचें। अदालत ने कहा कि ऐसी प्रवृत्ति न्यायालय की कार्यक्षमता कम करती है और समयबद्ध न्याय देने में बाधा उत्पन्न करती है।

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