फैसले में धारा 34 का उल्लेख छूटना घातक नहीं, यदि साझा मंशा साबित हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-20 08:17 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि अभियोजन पक्ष आरोपियों की साझा मंशा साबित करने में सफल रहा है, तो निर्णय के अंतिम भाग में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 का उल्लेख छूट जाना मामले के लिए घातक नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 34 कोई स्वतंत्र अपराध नहीं है, बल्कि यह साझा मंशा के आधार पर सामूहिक दायित्व तय करने का एक विधिक सिद्धांत है।

यह टिप्पणी जस्टिस सलील कुमार राय और जस्टिस अजय कुमार-द्वितीय की खंडपीठ ने वर्ष 2008 के हत्या के एक मामले में दोषसिद्ध चार आरोपियों की अपील खारिज करते हुए की। साथ ही, कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में तकनीकी संशोधन करते हुए दोषसिद्धि को IPC की धारा 302 के स्थान पर धारा 302 सहपठित धारा 34 के तहत माना।

मामले में चारों आरोपियों ने वर्ष 2013 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र जज, फतेहपुर द्वारा सुनाए गए आजीवन कारावास के फैसले को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि उन्हें केवल धारा 302 के तहत दोषी ठहराया गया, जबकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि घातक गोली किस आरोपी ने चलाई। इसलिए धारा 34 का सहारा लिए बिना उनकी दोषसिद्धि कानूनन टिक नहीं सकती।

हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि FIR, आरोपपत्र और ट्रायल कोर्ट द्वारा तय किए गए आरोप सभी धारा 302 सहपठित धारा 34 के तहत थे। इसके अलावा, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत दर्ज आरोपियों के बयानों में भी उनसे साझा मंशा के संबंध में प्रश्न पूछे गए। कोर्ट ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से माना था कि सभी आरोपियों ने पूर्व नियोजित योजना और साझा मंशा के तहत हथियारों का इस्तेमाल कर हत्या की, लेकिन अंतिम आदेश लिखते समय गलती से केवल धारा 302 का उल्लेख रह गया।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा,

"IPC की धारा 34 कोई स्वतंत्र अपराध नहीं है। FIR, आरोपपत्र और आरोप सभी IPC की धारा 302 सहपठित धारा 34 के तहत थे। धारा 313 के बयान में भी आरोपियों से उनकी साझा मंशा के संबंध में प्रश्न पूछे गए। ऐसे में अंतिम आदेश में धारा 34 का उल्लेख छूट जाना मात्र एक अनियमितता है।"

खंडपीठ ने यह भी दोहराया कि यदि धारा 34 के तहत अलग से आरोप तय न भी किया गया हो, लेकिन अभियोजन ने साझा मंशा से संबंधित साक्ष्य प्रस्तुत किए हों और बचाव पक्ष को उन पर जिरह का अवसर मिला हो, तो आरोपियों को धारा 34 के सहारे दोषी ठहराया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि साझा मंशा का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलना सामान्यतः कठिन होता है। इसका निर्धारण घटनाक्रम, परिस्थितियों और आरोपियों के आचरण से किया जाता है। यदि घटनाओं की श्रृंखला यह दर्शाती है कि आरोपियों का उद्देश्य केवल चोट पहुंचाना नहीं, बल्कि हत्या करना था, तो साझा मंशा परिस्थितियों से भी सिद्ध की जा सकती है।

मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि सभी आरोपी घातक हथियारों से लैस होकर घटनास्थल पर पहुंचे, मृतक और उसके परिवार को घेर लिया तथा उन्हें मार डालने के लिए ललकारा। इसके बाद वे एक मकान की छत पर चढ़ गए और अंधाधुंध फायरिंग की, जिससे मृतक की मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद सभी आरोपी एक साथ हथियार लेकर वहां से फरार हो गए।

कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के घटनास्थल पर आने से लेकर अपराध करने और फिर एक साथ वहां से भागने तक की पूरी घटनाक्रम यह साबित करता है कि वे पूर्व नियोजित योजना और साझा मंशा के साथ हत्या करने आए।

इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने चारों आरोपियों की अपील खारिज करते हुए उनकी आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी। हालांकि, विधिक स्थिति स्पष्ट करने के लिए दोषसिद्धि को IPC की धारा 302 से संशोधित कर IPC की धारा 302 सहपठित धारा 34 के तहत दर्ज करने का आदेश दिया।

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