बेटी की शादी 'पवित्र दायित्व': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषी को दी 7 दिन की अस्थायी जमानत

Update: 2026-04-15 12:03 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि बेटी का विवाह हिंदू जीवन पद्धति में एक पवित्र दायित्व है। इसी आधार पर अदालत ने एक दोषी व्यक्ति को अपनी बेटी की शादी में शामिल होने के लिए 7 दिन की अस्थायी जमानत प्रदान की।

जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र की पीठ ने यह आदेश देश राज नामक व्यक्ति की याचिका पर दिया, जिसने अपनी सजा के खिलाफ अपील लंबित होने के दौरान यह राहत मांगी थी।

मामले में याचिकाकर्ता को 2023 में लखनऊ सेशन कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास और 30,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। वह तब से जेल में बंद है।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसकी बेटी की शादी 23 मार्च, 2026 को निर्धारित है और वह इस महत्वपूर्ण अवसर पर उपस्थित होना चाहता है।

सरकारी पक्ष ने भी यह पुष्टि की कि विवाह की तिथि और कार्यक्रम की जानकारी स्थानीय पुलिस द्वारा सत्यापित की जा चुकी है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बेटी का विवाह हिंदू जीवन में एक पवित्र दायित्व माना जाता है और याचिकाकर्ता को इस अवसर पर शामिल होने की अनुमति दी।

अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 23 मार्च से 29 मार्च, 2026 तक अस्थायी जमानत पर रिहा किया जाए। इसके लिए उसे 20,000 रुपये का निजी मुचलका और समान राशि के दो जमानतदार देने होंगे।

साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि वह 30 मार्च, 2026 की सुबह पुनः ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करे।

इस प्रकार, हाईकोर्ट ने मानवीय आधार पर याचिका स्वीकार करते हुए सीमित अवधि के लिए राहत प्रदान की।

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