“पिता बेटी को साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता”: अंतरधार्मिक शादी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलग धर्म के युवक से शादी करने वाली एक बालिग महिला को उसके पिता की कथित हिरासत से मुक्त करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि बालिग महिला को यह तय करने का अधिकार है कि वह किसके साथ रहना चाहती है और पिता उसे उसकी इच्छा के खिलाफ अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने यह आदेश प्रिंसी की ओर से उसके पति/नेक्स्ट फ्रेंड गुरप्रीत सिंह द्वारा दाखिल हैबियस कॉर्पस याचिका पर दिया।
याचिका के मुताबिक, प्रिंसी की गुरप्रीत से फरवरी 2025 में सोशल मीडिया के जरिए मुलाकात हुई थी। वह 19 सितंबर 2025 को अपनी इच्छा से घर छोड़कर नोएडा चली गईं। गुरप्रीत सिख धर्म को मानते हैं, जबकि प्रिंसी हिंदू हैं। दोनों ने दावा किया कि उन्होंने 4 नवंबर 2025 को नोएडा के एक मंदिर में शादी की थी।
आरोप है कि बाद में प्रिंसी को भाइयों को राखी बांधने के लिए घर बुलाया गया, लेकिन पिता और परिवार के सदस्यों ने उन्हें वापस जाने नहीं दिया। उन्होंने पति को कथित तौर पर मैसेज कर मारपीट और उत्पीड़न की शिकायत भी की।
पिता ने शादी की वैधता पर उठाया सवाल
पिता की ओर से दलील दी गई कि मंदिर में शादी के दौरान सप्तपदी की रस्म हुई थी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है, इसलिए विवाह की वैधता पर सवाल है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में शादी करने वाले पक्ष स्वयं विवाह की वैधता पर विवाद नहीं कर रहे हैं, इसलिए हैबियस कॉर्पस याचिका में सप्तपदी के विवाद को तय करना जरूरी नहीं है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Soni Gerry v. Gerry Douglas और Shafin Jahan v. Asokan K.M. फैसलों का हवाला देते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पार्टनर चुनने के अधिकार पर जोर दिया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने कहा:
“शादी वैध है या नहीं, बालिग महिला को अपने पिता के साथ न रहने का कानूनी अधिकार है और पिता उसे अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।”
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रिंसी ने स्पष्ट रूप से अपने पति के साथ रहने की इच्छा जताई है। इसके बाद कोर्ट ने हैबियस कॉर्पस याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें पिता की हिरासत से मुक्त करने का आदेश दिया।