इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965 को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यह कानून भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 से असंगत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि 1965 के अधिनियम का मूल उद्देश्य उत्तर प्रदेश में आवास और विकास से जुड़ी योजनाओं का निर्माण और उनका क्रियान्वयन है, जबकि अनिवार्य भूमि अधिग्रहण इन योजनाओं को पूरा करने का केवल एक सहायक साधन है।

जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि 1965 का अधिनियम अपने मूल स्वरूप और प्रमुख उद्देश्य के आधार पर संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 5 और 18 के अंतर्गत आता है। यह समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 के तहत मुख्य रूप से भूमि अधिग्रहण से संबंधित कानून नहीं है। इसलिए दोनों कानूनों के बीच संवैधानिक टकराव का सवाल नहीं उठता।

मामला अयोध्या में आवास विकास परिषद द्वारा तैयार की गई तीन योजनाओं और उनके लिए की गई भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही से जुड़ा था। इस संबंध में एक जनहित याचिका और नौ रिट याचिकाएं दायर की गईं। याचिकाओं में 1965 के अधिनियम की धाराओं 28, 31(1), 32 और 55 की संवैधानिक वैधता के साथ-साथ योजनाओं और भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही को चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट संदीप दीक्षित ने दलील दी कि भले ही 1965 का पूरा अधिनियम भूमि अधिग्रहण से संबंधित न हो, लेकिन जिन प्रावधानों के तहत भूमि अधिग्रहण किया जाता है, वे संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 के अंतर्गत आते हैं। उनका तर्क था कि संपत्ति के अधिग्रहण के लिए कानून बनाने की शक्ति एक स्वतंत्र विधायी शक्ति है। इसे किसी अन्य विषय पर कानून बनाने की सहायक शक्ति नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि कुछ राज्यों ने 2013 के कानून की धारा 105 में संशोधन कर अपने विशेष कानूनों को चौथी अनुसूची में शामिल किया, जबकि उत्तर प्रदेश ने ऐसा नहीं किया। इसलिए 2013 के कानून के प्रावधान उत्तर प्रदेश में किसी भी राज्य कानून के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण पर लागू होने चाहिए।

राज्य सरकार और आवास विकास परिषद की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया। उनका कहना था कि 1965 का अधिनियम मूल रूप से राज्य सूची की प्रविष्टि 5 और 18 के तहत बनाया गया। भूमि अधिग्रहण से संबंधित प्रावधान केवल विकास योजनाओं को लागू करने के लिए सहायक हैं। ऐसे में समवर्ती सूची के किसी विषय में केवल आकस्मिक या सहायक रूप से प्रभाव पड़ने से संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत टकराव पैदा नहीं होता।

कोर्ट ने 1965 के अधिनियम की पूरी योजना और उसके प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद कहा कि आवास और विकास योजनाओं को बनाना और लागू करना आवास विकास परिषद का मूल कार्य है। भूमि अधिग्रहण इन योजनाओं को पूरा करने का माध्यम मात्र है।

पीठ ने कहा कि 1965 के अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य विकास है, भूमि अधिग्रहण नहीं। भूमि अधिग्रहण केवल विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने और उन्हें लागू करने में सहायता करता है।

हाईकोर्ट ने इस संबंध में ऑफशोर होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम बैंगलोर डेवलपमेंट अथॉरिटी मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में बैंगलोर विकास प्राधिकरण कानून को राज्य सूची की प्रविष्टि 5 और 18 के तहत माना गया, न कि समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 के तहत। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश के कानून की योजना भी काफी हद तक इसी प्रकार की है।

2013 का कानून पुराने भूमि अधिग्रहण कानून का स्थान लेता है, लेकिन यहां सीधा टकराव नहीं

1965 के अधिनियम की धारा 55 और उसकी अनुसूची के तहत भूमि अधिग्रहण के लिए 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को कुछ संशोधनों के साथ लागू किया गया था। बाद में 2013 के कानून की धारा 114 के जरिए 1894 का कानून समाप्त किया गया।

इस आधार पर यह सवाल उठा कि क्या 1894 के कानून के प्रावधान, जिन्हें 1965 के अधिनियम में शामिल किया गया था, 2013 के कानून के लागू होने के बाद समाप्त हो गए।

कोर्ट ने कहा कि 1965 के अधिनियम में शामिल किए गए 1894 के कानून के प्रावधान केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाते कि मूल कानून को बाद में निरस्त कर दिया गया है। विधायी समावेशन के सिद्धांत के तहत शामिल किए गए प्रावधान 1965 के अधिनियम का हिस्सा बन चुके थे। हालांकि, ऐसे प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कुछ अपवाद लागू हो सकते हैं।

पीठ ने स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम एमवी नरसिम्हन और उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद बनाम जैनुल इस्लाम मामलों में निर्धारित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि विधायी समावेशन के अपवाद केवल कानून में संशोधन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मूल कानून के निरस्त होने की स्थिति में भी उनके सिद्धांत लागू हो सकते हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि 1894 के कानून के निरस्त होने से आवास विकास परिषद अपनी भूमि अधिग्रहण की शक्ति नहीं खोती। 1965 के अधिनियम की धारा 17(ए) को धारा 55 के साथ पढ़ने पर परिषद के पास अनिवार्य भूमि अधिग्रहण की शक्ति बनी रहती है।

2013 के कानून की धारा 103 भी टकराव नहीं मानती

हाईकोर्ट ने 2013 के कानून की धारा 103 पर भी विचार किया। इस धारा में कहा गया कि 2013 का कानून उस समय लागू किसी अन्य कानून के अतिरिक्त होगा और उसके प्रावधान किसी अन्य कानून को समाप्त करने के बजाय उसके साथ लागू होंगे।

कोर्ट ने कहा कि धारा 103 के शब्द ही यह स्पष्ट करते हैं कि 2013 का कानून अन्य कानूनों का स्थान लेने के बजाय उनके साथ सह-अस्तित्व की व्यवस्था करता है। हालांकि, 2013 के कानून की धारा 103 से 108 तक के प्रावधान उस स्थिति में लागू होंगे, जब संबंधित दोनों कानून मूल रूप से समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 के अंतर्गत आते हों।

पीठ ने कहा कि 1965 का अधिनियम और 2013 का कानून अलग-अलग संवैधानिक प्रविष्टियों के अंतर्गत आते हैं। एक राज्य कानून है और दूसरा संसद द्वारा बनाया गया कानून। इसलिए दोनों कानून एक ही विधायी क्षेत्र में नहीं आते और उनके बीच अनुच्छेद 254 के तहत असंगति का प्रश्न नहीं उठता।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 1965 के अधिनियम की धारा 55 और उसकी अनुसूची को 2013 के कानून के लाभों के बिना लागू करने पर भूमि मालिकों के साथ असमान व्यवहार की स्थिति पैदा होगी। इसलिए कोर्ट ने इन प्रावधानों को रद्द करने के बजाय उनकी ऐसी व्याख्या की, जिसके तहत 1965 के अधिनियम के तहत भूमि मालिकों को मिलने वाला मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन 2013 के कानून के समान मानकों पर सुनिश्चित किया जाए।

इस तरह हाईकोर्ट ने 1965 के अधिनियम को 2013 के कानून से असंगत या निरस्त कानून मानने से इनकार किया, लेकिन भूमि मालिकों के हितों की सुरक्षा के लिए मुआवजे और पुनर्वास के मामले में 2013 के कानून के मानकों को लागू करने का निर्देश दिया।

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