इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965 के तहत अनिवार्य रूप से अधिग्रहित की जाने वाली जमीन के मालिकों को भी भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के समान मानकों के अनुसार मौद्रिक और गैर-मौद्रिक लाभ दिए जाने चाहिए।

जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि किसी अलग कानून या अलग प्राधिकरण के तहत जमीन अधिग्रहित किए जाने के आधार पर भूमि मालिकों के साथ मुआवजे और पुनर्वास के मामले में अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमाना और भेदभावपूर्ण होगा।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965 की धारा 55 और उसकी अनुसूची को असंवैधानिक घोषित करने के बजाय उनकी ऐसी व्याख्या की, जिससे भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही में 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधान या कम से कम उसमें निहित मूल सिद्धांत लागू किए जा सकें।

मामला अयोध्या में आवास विकास परिषद की तीन योजनाओं से जुड़ा था। इनमें एक मुख्य योजना और दो पूरक योजनाएं थीं, जो छह गांवों में फैली थीं। इन योजनाओं के लिए जमीन अलग-अलग तरीकों से ली गई। कुछ जमीन आपसी बातचीत से खरीदी गई, कुछ भूमि पूलिंग के जरिए ली गई और कुछ का अनिवार्य अधिग्रहण किया गया।

हाईकोर्ट के समक्ष विवाद अनिवार्य अधिग्रहण को लेकर था। यह अधिग्रहण 1965 के अधिनियम को 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के साथ पढ़ते हुए किया गया था, न कि सीधे 2013 के कानून के तहत।

इस मामले में जनहित याचिका सहित नौ रिट याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें 1965 के अधिनियम की धाराओं 28, 31(1), 32 और 55 की संवैधानिक वैधता के साथ-साथ योजनाओं, अधिग्रहण की कार्यवाही और मुआवजा निर्धारण को चुनौती दी गई। कुछ याचिकाकर्ताओं ने कानून की वैधता को चुनौती दिए बिना 2013 के कानून के अनुसार मुआवजा और पुनर्वास की मांग की।

कोर्ट ने कहा कि मुआवजे के उद्देश्य से किसी भी कानून के तहत अधिग्रहित भूमि के मालिक एक ही वर्ग में आते हैं। केवल इस आधार पर उनके साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता कि उनकी जमीन किसी दूसरे कानून के तहत या किसी दूसरे प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित की गई। हालांकि, यदि अधिग्रहण स्वयं भूमि मालिकों के लाभ के लिए हो तो स्थिति अलग हो सकती है।

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ के नागपुर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट बनाम विठ्ठल राव और उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद बनाम जैनुल इस्लाम मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार या आवास विकास परिषद की ओर से ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे 1965 के अधिनियम के तहत अधिग्रहित जमीन के मालिकों को 2013 के कानून के तहत अधिग्रहित जमीन के मालिकों से अलग व्यवहार करने को उचित ठहराया जा सके।

खंडपीठ ने कहा कि 1965 के अधिनियम को 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के साथ पढ़ने पर भूमि मालिकों को पुनर्स्थापन या उचित मुआवजे के मामले में अलग वर्ग मानने के लिए कोई तार्किक आधार नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजा केवल मौद्रिक भुगतान तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि 1965 के अधिनियम की धारा 21 में स्वयं पुनर्वास का प्रावधान है। इससे स्पष्ट है कि कानून ने पुनर्स्थापन को केवल आर्थिक मुआवजे तक सीमित नहीं रखा।

हालांकि, इस प्रावधान में पुनर्वास योजना तैयार करने की प्रक्रिया और उसका चरण स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किया गया। कोर्ट ने 2013 के कानून और 1965 के अधिनियम की तुलना करते हुए पाया कि 2013 के कानून में मुआवजे, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के मानक अधिक व्यापक और लाभकारी हैं।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आवास विकास परिषद खुद इन योजनाओं में मौद्रिक मुआवजा 2013 के कानून के अनुसार निर्धारित कर रही थी, जबकि 1965 के कानून में ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं था। ऐसे में परिषद या राज्य सरकार के लिए पुनर्वास और पुनर्स्थापन से जुड़े बाकी लाभों का विरोध करना उचित नहीं होगा।

खंडपीठ ने कहा कि यदि धारा 55 और उसकी अनुसूची को 2013 के कानून की सहायता के बिना लागू किया जाए तो भूमि मालिकों के साथ मनमाना और भेदभावपूर्ण व्यवहार होगा। कोर्ट ने कहा कि धारा 55 समान लोगों के साथ असमान व्यवहार की स्थिति पैदा करती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 300ए के अनुरूप नहीं है।

कोर्ट ने हालांकि इन प्रावधानों को रद्द नहीं किया। खंडपीठ ने कहा कि अदालतों को ऐसी व्याख्या अपनानी चाहिए, जिससे कानून का प्रावधान बचा रहे। इसी आधार पर धारा 55 और उसकी अनुसूची को इस शर्त के साथ कायम रखा गया कि 1965 के अधिनियम के तहत भूमि मालिकों को मिलने वाले लाभ 2013 के कानून के तहत उपलब्ध लाभों से कम नहीं होंगे।

वहीं, धारा 28, 31 और 32 को असंवैधानिक घोषित करने से कोर्ट ने इनकार किया। खंडपीठ ने कहा कि ये धाराएं मुख्य रूप से योजनाओं की अधिसूचना और मंजूरी से संबंधित हैं। इनमें मुआवजे या पुनर्स्थापन के मानक निर्धारित नहीं किए गए।

हाईकोर्ट ने अयोध्या की योजनाओं या पहले से की गई अधिग्रहण कार्यवाही रद्द करने से भी इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से कई वर्षों की प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ती और योजनाओं के व्यापक सार्वजनिक उद्देश्य पर असर पड़ता। कुछ जमीन पहले ही तीसरे पक्ष को आवंटित की जा चुकी है।

इसके बजाय कोर्ट ने अपने अनुच्छेद 226 के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया कि भूमि मालिकों को 2013 के कानून के अनुसार मौद्रिक मुआवजा दिया जाए। पहले से दिए गए मुआवजे के आदेशों की भी आवश्यकता के अनुसार तत्काल समीक्षा की जाए, ताकि वे 2013 के कानून के अनुरूप हो सकें।

आवास विकास परिषद को यह पता लगाने का निर्देश दिया गया कि अधिग्रहण के कारण कितने भूमि मालिक अपनी पूरी जमीन से विस्थापित हुए हैं। यदि ऐसे भूमि मालिक पाए जाते हैं तो परिषद को 1965 के अधिनियम की धारा 21 को 2013 के कानून के संबंधित प्रावधानों के साथ पढ़ते हुए छह महीने के भीतर पुनर्वास योजना तैयार कर उसे लागू करना होगा।

हालांकि, यदि 2013 के कानून की धारा 31 और 47 के तहत पुनर्वास संबंधी दायित्व को मौद्रिक रूप में तय कर उसका पूरा भुगतान करना संभव हो, तो उसी के जरिए दायित्व पूरा किया जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मुआवजा आदेश से असंतुष्ट भूमि मालिक कानून के अनुसार उसे चुनौती दे सकते हैं। ऐसी चुनौती में हाईकोर्ट के इस फैसले में तय किए गए मुद्दों को आधार बनाया जा सकेगा।

इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने सभी रिट याचिकाओं का निस्तारण किया।

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