ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का अधिकार: DM का प्रमाणपत्र जेंडर की अंतिम पुष्टि, पासपोर्ट प्राधिकरण मेडिकल जांच की मांग नहीं कर सकता : इलाहाबाद हाइकोर्ट
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 की धारा 7 के तहत जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया प्रमाणपत्र जेंडर/पहचान का अंतिम और निर्णायक प्रमाण है। पासपोर्ट प्राधिकरण ऐसे मामले में दोबारा मेडिकल जांच या जन्म प्रमाणपत्र में बदलाव की शर्त नहीं रख सकता।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने खुश आर गोयल की याचिका का निस्तारण करते हुए यह टिप्पणी की।
याचिका में पासपोर्ट अधिकारियों की उस कार्रवाई को चुनौती दी गई, जिसमें उनसे पुनः मेडिकल जांच कराने को कहा गया था।
पूरा मामला
याचिकाकर्ता का जन्म महिला के रूप में हुआ लेकिन बाद में उन्होंने स्वयं को ट्रांसजेंडर के रूप में पहचाना। उन्होंने वर्ष 2019 के अधिनियम की धारा 5 और 6 के तहत आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त किया। बालिग होने के बाद उन्होंने जेंडर चेंज शल्यक्रिया करवाई और पुरुष के रूप में अपनी पहचान स्थापित की।
इसके बाद ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) नियम, 2020 के नियम 6 तथा अधिनियम की धारा 7 के तहत जिला मजिस्ट्रेट से संशोधित पहचान पत्र और प्रमाणपत्र (फॉर्म-4) प्राप्त किया, जिसमें उनका जेंडर स्पष्ट रूप से पुरुष दर्ज किया गया।
प्रमाणपत्र की धारा 5 में स्पष्ट उल्लेख था कि धारक को अपने सभी आधिकारिक दस्तावेजों में नाम और जेंडर परिवर्तन का अधिकार है।
इसके बावजूद पासपोर्ट प्राधिकरण ने उन्हें अपने पैनल के हॉस्पिटल से पुनः मेडिकल परीक्षण कराने को कहा। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि पासपोर्ट में संशोधन से पहले जन्म प्रमाणपत्र में नाम और जेंडर परिवर्तन कराना आवश्यक होगा।
हाइकोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने प्रतिवादियों की इन मांगों को खारिज करते हुए कहा कि 2019 का अधिनियम ऐसे व्यक्तियों को संरक्षण देने के उद्देश्य से बनाया गया, जो अपनी पहचान से मेल न खाने वाले शरीर में जन्म लेने के कारण सामाजिक बहिष्कार का सामना करते हैं।
पीठ ने कहा कि संसद ने यह विशेष कानून इसलिए बनाया ताकि ऐसे व्यक्तियों को गरिमा और समान अधिकार सुनिश्चित किए जा सकें और उन्हें अपनी वास्तविक पहचान छिपाने के लिए मजबूर न होना पड़े।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी प्रमाणपत्र की धारा 5 के अनुसार धारक को सभी आधिकारिक दस्तावेजों में नाम और जेंडर परिवर्तन का अधिकार है।
अदालत ने कहा कि आधिकारिक दस्तावेज में वे सभी दस्तावेज शामिल है, जो राज्य या राज्य की किसी इकाई के समक्ष पहचान के उद्देश्य से प्रस्तुत किए जाते हैं। पासपोर्ट जारी करना राज्य का एक संप्रभु कार्य है इसलिए वह भी इसी श्रेणी में आता है।
पीठ ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट का प्रमाणपत्र ही इस विवाद का अंतिम समाधान है और पासपोर्ट प्राधिकरण को किसी अतिरिक्त दस्तावेज या मेडिकल टेस्ट की मांग करने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने टिप्पणी की,
“पासपोर्ट प्राधिकरण को याचिका के पृष्ठ संख्या 50 और 51 पर संलग्न दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट जारी करना चाहिए। पहचान और जेंडर के प्रमाण के लिए किसी अतिरिक्त दस्तावेज की आवश्यकता नहीं है।”
इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को अनावश्यक प्रशासनिक शर्तों के जरिए बाधित नहीं किया जा सकता।