कोर्ट्स, SC/ST समुदाय से पीड़ित होने के आधार पर ही BNSS की धारा 173(4) के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए बाध्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-03-11 04:35 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि कोई स्पेशल कोर्ट या मजिस्ट्रेट, BNSS की धारा 173(4) के तहत दायर किसी आवेदन पर FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए अपने आप बाध्य नहीं है, सिर्फ इसलिए कि आवेदक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित है।

जस्टिस अनिल कुमार-X की बेंच ने आगे कहा कि कोर्ट को सबसे पहले अपने सामने रखे गए आरोपों का मूल्यांकन करना होगा और उसके बाद यह तय करना होगा कि पुलिस द्वारा जांच का निर्देश देना उचित है या मामले को शिकायत मामले के तौर पर आगे बढ़ाना।

इन टिप्पणियों के साथ सिंगल जज ने कुसुम कन्नौजिया द्वारा दायर आपराधिक अपील खारिज की। इस अपील में आज़मगढ़ के स्पेशल जज (SC/ST Act) द्वारा जनवरी 2026 में पारित एक आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें BNSS की धारा 173(4) के तहत उनका आवेदन खारिज कर दिया गया था।

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि FIR दर्ज करने का निर्देश देने के बजाय ट्रायल कोर्ट ने खुद ही आरोपों की जांच की, जो कि उचित नहीं था।

आगे यह भी तर्क दिया गया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 4 और 1995 के नियमों के नियम 5 के तहत किसी भी कोर्ट को ऐसी प्रारंभिक जांच करने से सख्ती से मना किया गया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज किया, क्योंकि वह राज्य सरकार की इस दलील से सहमत था कि BNSS की धारा 173(4) के तहत आवेदन मिलने पर कोर्ट्स को केवल 'पोस्ट ऑफिस' की तरह काम नहीं करना है।

कोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा संदर्भित प्रावधानों की भी जांच की और पाया कि धारा 4 उन सरकारी कर्मचारियों को दंडित करने से संबंधित है, जो जानबूझकर अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहते हैं, जैसे कि FIR दर्ज करने में लापरवाही बरतना, पीड़ितों को सुरक्षा देने में विफल रहना, या समय पर चार्जशीट दायर न करना।

इसी तरह कोर्ट ने यह भी पाया कि नियम 5 पुलिस अधिकारियों को तुरंत FIR दर्ज करने का आदेश देता है, जबकि धारा 18-A इस अधिनियम के तहत आने वाले मामलों में FIR दर्ज करने से पहले किसी भी प्रारंभिक जांच या पूर्व-अनुमति लेने पर रोक लगाती है।

बेंच ने आगे कहा कि ये प्रावधान, BNSS की धारा 173(4) के तहत किसी आवेदन पर विचार करते समय कोर्ट के न्यायिक विवेक को न तो कम करते हैं और न ही उसे छीनते हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि इन प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य अपराधों के पंजीकरण और जांच के संबंध में पुलिस अधिकारियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों के कर्तव्यों को विनियमित करना है।

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि ये प्रावधान BNSS की धारा 173(4) के तहत किसी आवेदन पर विचार करते समय कोर्ट के न्यायिक विवेक को न तो कम करते हैं और न ही छीनते हैं।

कोर्ट ने आगे कहा कि BNSS की धारा 173(4) के तहत कोर्ट को दी गई शक्ति, पहले CrPC की धारा 156(3) के तहत प्रयोग की जाने वाली शक्ति के समान है, जो कि विवेकाधीन प्रकृति की है।

बेंच ने कहा,

"FIR दर्ज करने और जांच का निर्देश देने से पहले कोर्ट को आवेदन में लगाए गए आरोपों की जांच करना और मामले के तथ्यों पर अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना ज़रूरी है। यदि कोर्ट को लगता है कि तत्काल पुलिस जांच आवश्यक नहीं है तो वह आवेदन को एक शिकायत मामले के रूप में मान सकता है और शिकायतकर्ता तथा गवाहों के बयान दर्ज करके, शिकायत मामलों के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ सकता है।"

बेंच ने हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें यह कहा गया कि SC-ST Act के तहत अपराधों से जुड़े मामलों में भी कोर्ट को यह जांच करनी चाहिए कि क्या आरोप पीड़ित की जाति से जुड़े किसी प्रथम दृष्टया अपराध को दर्शाते हैं।

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने याचिका खारिज की।

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