AIIMS भर्ती विज्ञापन के खिलाफ याचिका पर सुनवाई से इलाहाबाद हाइकोर्ट का इनकार, कहा- उपाय CAT के पास

Update: 2026-03-10 08:16 GMT

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने AIIMS रायबरेली द्वारा जारी भर्ती विज्ञापन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया। हाइकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस प्रकार के मामलों के लिए उचित मंच केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) है, इसलिए याचिका वहां दायर की जानी चाहिए।

यह आदेश जस्टिस प्रकाश सिंह की एकल पीठ ने पारित किया। हाइकोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज की।

मामले में याचिकाकर्ता ने AIIMS रायबरेली द्वारा जारी उस भर्ती विज्ञापन को चुनौती दी थी, जिसमें सहायक भंडार अधिकारी के दो पद और निजी सचिव के तीन पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए। याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाइकोर्ट में दायर की गई और विज्ञापन रद्द करने की मांग की गई।

सुनवाई के दौरान प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई कि चूंकि यह मामला केंद्रीय सेवाओं से जुड़ा है, इसलिए इसका समाधान CAT के समक्ष होना चाहिए। इस पर हाइकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 14 का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अधिकरण को सभी अदालतों की तरह अधिकार और शक्तियां प्राप्त हैं।

जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध निर्णय एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ का भी हवाला दिया। आदेश में कहा गया कि अधिकरणों को संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों की वैधता की जांच करने का अधिकार प्राप्त है।

अदालत ने कहा,

“संविधान के अनुच्छेद 323ए और 323बी के तहत गठित अधिकरणों को वैधानिक प्रावधानों तथा नियमों की संवैधानिक वैधता की जांच करने का अधिकार प्राप्त है।”

हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि जिस संस्था ने भर्ती विज्ञापन जारी किया, उसे केंद्र सरकार ने 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया। जबकि याचिका 8 जनवरी, 2026 को दायर की गई और विज्ञापन 11 नवंबर, 2025 का है।

अदालत ने प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम की धारा 29 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी मामले के लंबित रहने के दौरान संस्था अधिसूचित हो जाती है तो वह मामला अधिकरण को स्थानांतरित किया जा सकता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि अधिसूचना याचिका दाखिल होने के बाद जारी हुई, हाइकोर्ट में मामला सुनवाई योग्य नहीं हो जाता। इसलिए ऐसे मामलों की कार्यवाही प्रारंभ से ही अधिकरण के समक्ष की जानी चाहिए।

इसी आधार पर हाइकोर्ट ने याचिका अयोग् मानते हुए खारिज की।

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