बच्चे की कस्टडी आर्थिक रूप से सक्षम होने का दावा कर दी, तो पूरा भरण-पोषण पिता पर नहीं डाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-16 12:23 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कामकाजी मां अपनी आर्थिक क्षमता का दावा करते हुए नाबालिग बच्चे की कस्टडी प्राप्त करती है तो बाद में वह बच्चे के भरण-पोषण का पूरा वित्तीय बोझ केवल पिता पर नहीं डाल सकती। यदि मां भी पर्याप्त आय अर्जित कर रही है, तो बच्चे के खर्च दोनों माता-पिता अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार वहन करेंगे।

जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने यह टिप्पणी करते हुए एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज की। याचिका में फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें महिला को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया गया, जबकि बेटी के लिए तीन हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण निर्धारित किया गया।

मामले में महिला का कहना था कि बेटी को दी गई अंतरिम भरण-पोषण राशि बेहद कम है। उसने यह भी दावा किया कि उसके पास स्वयं के भरण-पोषण का कोई साधन नहीं है। महिला ने कहा कि वर्ष 2022 में उसने केवल तीन महीने संविदा पर काम किया था और पति के दबाव के कारण उसे नौकरी छोड़नी पड़ी।

वहीं, पति ने अदालत में वेतन पर्ची पेश कर दावा किया कि महिला प्रति माह 14,125 रुपये वेतन प्राप्त कर रही है। उसने यह भी कहा कि महिला द्वारा नौकरी छोड़ने का कोई दस्तावेजी प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है। पति ने यह भी आरोप लगाया कि सर्वोच्च न्यायालय के राजनेश बनाम नेहा फैसले के अनुसार दाखिल हलफनामे में महिला ने जानबूझकर अपनी आय और व्यवसाय से संबंधित कॉलम खाली छोड़ दिया।

पति ने यह भी बताया कि पहले बेटी उसके साथ रह रही थी और उसका पालन-पोषण वही कर रहा था। बाद में महिला ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर बेटी की अभिरक्षा मांगी और उसमें स्वयं को अपनी तथा बेटी की देखभाल करने में पूरी तरह सक्षम बताया। इसी आधार पर उसे अभिरक्षा मिली।

हाईकोर्ट ने पति के तर्कों को स्वीकार करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने सही पाया था कि महिला अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा फैसले का हवाला देते हुए कहा कि नाबालिग बच्चे के भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा और शिक्षा जैसे आवश्यक खर्चों की व्यवस्था होना जरूरी है। सामान्यतः शिक्षा का खर्च पिता उठाता है, लेकिन यदि मां भी कामकाजी है और पर्याप्त आय अर्जित कर रही है तो ऐसे खर्च दोनों माता-पिता अपनी-अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार साझा करेंगे।

अदालत ने कहा,

"जब महिला ने स्वयं अपनी आर्थिक क्षमता का दावा कर बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त की है, तब वह नाबालिग के पूरे भरण-पोषण का वित्तीय दायित्व केवल पिता पर नहीं डाल सकती।"

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि बच्ची के आवश्यक खर्चों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, पिता की आय में कोई बड़ा इजाफा हुआ या महिला की आर्थिक स्थिति बाद में खराब हुई है। ऐसे में फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने महिला और उसकी नाबालिग बेटी की पुनरीक्षण याचिका खारिज की।

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