सहमति से शादी करने वाले बालिगों के मामले में पुलिस को दखल का अधिकार नहीं, अपराध की जांच करे, विवाह की नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बालिग महिला के कथित अपहरण के मामले में दर्ज FIR रद्द करते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि दो बालिग व्यक्तियों के आपसी सहमति से किए गए विवाह की जांच करना पुलिस का काम नहीं है। पुलिस का दायित्व अपराधों की जांच करना है, न कि वयस्कों के विवाह में दखल देना।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दंपति की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि इस मामले में जांच जारी रखना न केवल आपराधिक कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी गंभीर उल्लंघन है।
अदालत ने कहा,
"हम पुलिस को कई बार याद दिला चुके हैं कि विवाह की जांच करना उनका काम नहीं है। उन्हें अपराधों की जांच करनी चाहिए। यहां कोई अपराध हुआ ही नहीं है, जिसकी जांच की आवश्यकता हो।"
मामले में महिला के पिता ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के तहत FIR दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर विवाह के उद्देश्य से ले जाया गया।
दंपति ने हाईकोर्ट को बताया कि दोनों बालिग हैं और उन्होंने 18 फरवरी 2026 को अपनी इच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया। इसके बावजूद, महिला का परिवार पुलिस के साथ मिलकर उन्हें अलग करने और महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध पिता के पास भेजने का प्रयास कर रहा है।
सुनवाई के दौरान महिला ने स्वयं अदालत के समक्ष उपस्थित होकर स्पष्ट कहा कि उसने अपनी इच्छा से विवाह किया और वह अपने पति के साथ ही रहना चाहती है।
इसके बाद हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया माना कि प्राथमिकी में जांच योग्य कोई मामला नहीं बनता और जांच तथा दंपति की गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी। साथ ही पुलिस को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
बाद में राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि जांच पूरी करने से पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 180 और 183 के तहत दोनों के बयान दर्ज किए जाने बाकी हैं।
इस पर हाईकोर्ट ने राज्य का पक्ष खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में जांच योग्य कोई तथ्य ही नहीं है और पुलिस अपना समय पूरी तरह व्यर्थ कर रही है।
अदालत ने कहा कि दोनों पक्ष शिक्षित और बालिग हैं तथा उन्होंने अपनी इच्छा से विवाह किया है। ऐसे में बहला-फुसलाकर ले जाने या किसी प्रकार के प्रलोभन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
पुलिस अधीक्षक द्वारा महिला का दोबारा बयान दर्ज करने पर जोर देने को भी अदालत ने अनुचित बताया।
अदालत ने कहा कि जब महिला अपना बयान पहले ही हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष दे चुकी है, तब किसी भी अदालत या पुलिस अधिकारी को उसी मामले में उसका दोबारा बयान दर्ज करने या अलग राय बनाने का अधिकार नहीं है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि पुलिस वास्तव में निष्पक्ष होती तो हाईकोर्ट में दर्ज महिला के बयान के आधार पर जांच समाप्त कर सकती थी।
अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ताओं का यह आरोप सही प्रतीत होता है कि पुलिस महिला के पिता का पक्ष लेते हुए अनावश्यक रूप से जांच जारी रखना चाहती है।
अदालत ने कहा,
"किसी बालिग व्यक्ति द्वारा अपनी पसंद के जीवनसाथी का चयन कर विवाह करना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। दो बालिग नागरिकों के विवाह की जांच जारी रखना न केवल कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकार का भी घोर उल्लंघन है। पुलिस को इस मामले में ताक-झांक करने का कोई अधिकार नहीं है।"
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने FIR रद्द की। साथ ही भदोही के पुलिस अधीक्षक और सुरियावां थाने के थाना प्रभारी पर संयुक्त रूप से 1,000 रुपये का हर्जाना लगाते हुए यह राशि महिला को देने का निर्देश दिया। महिला के पिता पर भी 5,000 रुपये का हर्जाना लगाया गया।
अदालत ने निर्देश दिया कि एक सप्ताह के भीतर यह राशि जमा कराई जाए, अन्यथा इसे भू-राजस्व की बकाया राशि की तरह वसूल किया जाएगा। साथ ही संबंधित थाने की सामान्य डायरी में यह भी दर्ज करने का आदेश दिया कि इस मामले की आपराधिक कार्यवाही समाप्त की जा चुकी है।