इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसकी रिटायरमेंट से पहले शुरू की गई विभागीय कार्रवाई रिटायरमेंट के बाद अपने आप जारी नहीं रह सकती। सिविल सर्विस रेगुलेशंस के रेगुलेशन 351-ए के तहत रिटायरमेंट के बाद ऐसी कार्रवाई जारी रखने और उसके आधार पर कोई सजा देने के लिए गवर्नर की मंजूरी जरूरी है।

जस्टिस अनिल कुमार गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम श्री कृष्ण पांडे और भागीरथी जेना बनाम बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के फैसलों के साथ-साथ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले हरिहर भोले नाथ मिश्रा बनाम स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल पर भरोसा करते हुए यह फैसला सुनाया।

र्ट ने कहा कि रेगुलेशन 351-ए के तहत सरकारी कर्मचारी की रिटायरमेंट के बाद उसके खिलाफ पहले से शुरू की गई विभागीय कार्रवाई स्वतः जारी नहीं रह सकती। उसके आधार पर कोई दंड भी नहीं दिया जा सकता। यहां तक कि पहले से शुरू की गई कार्रवाई को जारी रखने के लिए भी गवर्नर की मंजूरी आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रेगुलेशन 351-ए के तहत कर्मचारी की रिटायरमेंट के चार साल बाद नई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती। पहले से शुरू कार्रवाई को रिटायरमेंट के बाद जारी रखने के लिए भी गवर्नर की मंजूरी लेना अनिवार्य है।

मामला बलिया के जिला समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में तैनात रहे एक वरिष्ठ लिपिक से जुड़ा था। उनके खिलाफ 11 अगस्त 2005 को विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। उन्होंने कुछ जरूरी दस्तावेज मांगे थे, लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद 30 अक्टूबर 2006 को एकतरफा जांच रिपोर्ट पेश कर दी गई।

कार्रवाई पूरी होने से पहले ही कर्मचारी 31 मार्च 2008 को रिटायर हो गए। विभागीय कार्रवाई लंबित होने के कारण उनके सेवानिवृत्ति लाभ भी रोक दिए गए।

बाद में एक आदेश जारी कर उन्हें पिछली तारीख से सेवा से हटाया हुआ माना गया। अपील में यह आदेश रद्द कर दिया गया और रेगुलेशन 351-ए के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद सामाजिक कल्याण निदेशक ने 27 दिसंबर 2011 के आदेश से कर्मचारी की 50 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से रोक दी।

स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल ने इस आदेश को रद्द किया। इसके खिलाफ राज्य की ओर से दायर याचिका को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 15 जनवरी 2014 को गवर्नर की मंजूरी नहीं होने के कारण खारिज कर दिया। इसके बाद सामाजिक कल्याण निदेशक ने 13 फरवरी 2014 को विभागीय कार्रवाई समाप्त कर दी।

इसके बावजूद 15 जनवरी 2015 को उसी विभागीय कार्रवाई के आधार पर एक नया आदेश पारित कर कर्मचारी की पेंशन का दो-तिहाई हिस्सा स्थायी रूप से रोक दिया गया। साथ ही 36,98,603 रुपये की वसूली का भी आदेश दिया गया।

हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से पेश वकील यह नहीं बता सके कि कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद गवर्नर की कोई मंजूरी ली गई थी। न तो विवादित आदेश में ऐसी मंजूरी का उल्लेख था और न ही राज्य के जवाबी हलफनामे में इसका कोई प्रमाण पेश किया गया।

कोर्ट ने कहा कि निदेशक इस तथ्य से पूरी तरह अवगत थे कि गवर्नर की मंजूरी नहीं ली गई। इसके बावजूद उन्होंने उसी कार्रवाई के आधार पर आदेश पारित किया। कोर्ट ने इसे कर्मचारी को परेशान करने और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले उसके वैध लाभों को रोकने की जानबूझकर की गई कोशिश माना।

हाईकोर्ट ने 15 जनवरी 2015 के विवादित आदेश रद्द करते हुए याचिका मंजूर की। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि कर्मचारी को उसके सभी देय रिटायरमेंट लाभ 8 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ आठ सप्ताह के भीतर जारी किए जाएं।

कोर्ट ने कहा कि आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारी संख्या तीन के समक्ष पेश किए जाने के आठ सप्ताह के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो देय राशि पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।

अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: