कानून की समझ अब सबसे निचले स्तर पर': हत्या के दोषी की जमानत रद्द कराने वाली जनहित याचिका खारिज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया 50 हजार रुपये का जुर्माना

Update: 2026-07-01 11:33 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक दोषी को दी गई जमानत और सजा पर रोक के आदेश को वापस लेने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।

अदालत ने याचिका में की गई मांगों को "चौंकाने वाली" और "बेहद अनुचित" करार दिया।

जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ ने कहा कि इस तरह की प्रार्थनाएं कभी भी याचिका का हिस्सा नहीं बननी चाहिए।

याचिका लालचंद यादव ने दायर की थी। इसमें उत्तर प्रदेश सरकार, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और संबंधित थाना प्रभारी को निर्देश देने की मांग की गई कि वे हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा हत्या के दोषी को दी गई जमानत और सजा पर रोक के आदेश को वापस लें।

याचिका में यह भी मांग की गई कि हाईकोर्ट में लंबित आपराधिक अपील को सुनवाई के लिए सांसद-विधायक मामलों की विशेष अदालत में भेज दिया जाए।

हाईकोर्ट ने शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया कि जिस अधिकार क्षेत्र का उपयोग किया गया और जिस प्रकार की राहत मांगी गई, उसके कारण मामले के गुण-दोष पर विचार करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

अदालत ने याचिकाकर्ता और उसके वकील की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि ऐसी प्रार्थनाएं "कभी कागज पर लिखी ही नहीं जानी चाहिए।"

पीठ ने कहा कि जब कोई याचिका वकील के माध्यम से दाखिल की जाती है तो यह अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों को कानून के अनुरूप ढालकर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेगा। लेकिन इस मामले में वकील ने याचिकाकर्ता की मांग के आगे झुकते हुए ऐसी प्रार्थनाएं शामिल कर दीं, जो पूरी तरह अनुचित थीं।

अदालत ने कहा,

"इतना समझने के लिए कानून का गहन प्रशिक्षण भी आवश्यक नहीं है कि इस प्रकार का निर्देश मांगना पूरी तरह बेतुका है और ऐसी प्रार्थना कभी लिखी ही नहीं जानी चाहिए।"

हाईकोर्ट ने समाज में कानून के प्रति घटती समझ पर भी चिंता व्यक्त की।

अदालत ने कहा,

"हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहां कानून की जानकारी बेहद कम होती जा रही है। विज्ञान और अन्य विषयों के बढ़ते प्रभाव के कारण नागरिकों में कानून की सामान्य समझ भी घट गई। कानून की समझ आज अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई।"

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि 15 दिनों के भीतर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराई जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि निर्धारित अवधि में जुर्माना जमा नहीं किया जाता है तो इसकी वसूली भू-राजस्व बकाया की तरह की जाएगी।

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