कोडीन तय सीमा से अधिक होने पर NDPS Act लागू, मिलावटी कफ सिरप मामले में दो आरोपियों को जमानत से इनकार: इलाहाबाद हाइकोर्ट
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने कोडीन आधारित कफ सिरप की अवैध खेप बरामद होने के मामले में दो आरोपियों की जमानत अर्जी खारिज की। अदालत ने कहा कि अधिसूचना में दी गई छूट का लाभ तभी मिलेगा जब उसकी शर्तों का कड़ाई से पालन किया जाए।
जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की पीठ ने कहा,
“अदालत की राय में छूट संबंधी प्रावधानों का सख्ती और शाब्दिक रूप से पालन किया जाना आवश्यक है तथा जिन शर्तों के अधीन छूट दी गई, उनका कठोरता से अनुपालन होना चाहिए, किसी भी शर्त का उल्लंघन दावेदार को छूट के लाभ से वंचित कर देगा। वर्तमान मामले में अवैध रूप से मोड़ी गई कोडीन आधारित कफ सिरप की भारी मात्रा बरामद हुई, जिससे 'मेडिकल उपयोग में स्थापित' होने की शर्त का खुला उल्लंघन हुआ।”
आरोपियों के खिलाफ NDPS Act 1985 की धारा 8/21 तथा भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धाराएं 318(4), 338, 336(3) और 340 के तहत मुकदमा दर्ज है। उनके पास से 119 डिब्बों में कुल 11,885 बोतलें कोडीन आधारित कफ सिरप बरामद हुईं, जिन्हें कार में लोड करते समय पकड़ा गया।
जमानत याचिका में आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि वे लाइसेंसधारी दवा विक्रेता हैं और कफ सिरप वैध बिलों के माध्यम से खरीदा गया। यह भी कहा गया कि उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है तथा ड्रग इंस्पेक्टर को नमूने लेने और सील करने का अधिकार नहीं था।
अदालत ने कहा कि 14 नवंबर, 1985 की केंद्र सरकार की अधिसूचना में 'कोडीन' (मिथाइल-मॉर्फीन) और उसके लवण, सभी घोल तथा तैयारियों को विनिर्मित मादक दवा की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया। केवल उसी स्थिति में अपवाद दिया गया, जब कोडीन मेडिकल उपयोग में हो तथा एक खुराक में 100 मिलीग्राम से कम और अविभाजित तैयारी में 2.5 प्रतिशत से अधिक सांद्रता न हो।
पीठ ने माना कि आरोपियों द्वारा अधिसूचना में दी गई शर्तों का उल्लंघन किया गया, इसलिए वे छूट का लाभ नहीं ले सकते।
11,885 बोतलों की बरामदगी का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा,
“आवेदक/आरोपी व्यक्तियों को झूठा फंसाने का कोई कारण नहीं पाया जाता। इसलिए इस स्तर पर उन्हें जमानत पर रिहा करने का कोई ठोस आधार नहीं है। आवेदकों के वकील द्वारा उठाई गई सभी दलीलें मामले के गुण-दोष से संबंधित हैं, जिन्हें जमानत पर विचार करते समय नहीं देखा जा सकता। इस चरण पर अदालत यह राय बनाने में असमर्थ है कि आरोपियों ने अपराध नहीं किया।”
इन टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाइकोर्ट ने दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कीं।