RTI Act के तहत जानकारी देने में जानबूझकर देरी या बाधा हो तभी लगेगा जुर्माना: इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार कानून (RTI Act) को लेकर एक अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल देरी या कमी के आधार पर दंड नहीं लगाया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो कि सूचना देने में जानबूझकर बाधा डाली गई या दुर्भावना से देरी की गई तब तक दंड नहीं लगाया जा सकता।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि RTI Act, 2005 की धारा 20 के तहत दंड लगाने से पहले आयोग को यह संतोष करना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी ने बिना उचित कारण के सूचना देने से इनकार किया, गलत जानकारी दी जानकारी नष्ट की या जानबूझकर बाधा उत्पन्न की।
कोर्ट ने कहा,
“हर देरी या त्रुटि दंड का आधार नहीं बन सकती बल्कि दुर्भावना या जानबूझकर की गई लापरवाही का होना आवश्यक शर्त है।”
मामला गाजियाबाद में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी और लोक सूचना अधिकारी के पद पर तैनात अधिकारी से जुड़ा है। एक आवेदक ने डुप्लीकेट पासपोर्ट, प्रक्रिया और समय-सीमा से संबंधित जानकारी मांगी थी। शुरुआती आवेदन गलत नाम से बने डिमांड ड्राफ्ट के कारण वापस कर दिया गया। बाद में संशोधित आवेदन देने के बावजूद तकनीकी कारणों से जानकारी देने में देरी हुई।
इस पर आवेदक ने शिकायत दर्ज की, जिसके बाद केंद्रीय सूचना आयोग ने अधिकारी पर चार महीने की देरी का आरोप लगाते हुए 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की।
अधिकारी ने इस कार्रवाई को हाइकोर्ट में चुनौती दी और कहा कि देरी स्टाफ की कमी और काम के अत्यधिक दबाव के कारण हुई, न कि किसी दुर्भावना से।
हाईकोर्ट ने पाया कि आयोग ने बिना पूरी जांच रिपोर्ट का इंतजार किए ही दंड लगा दिया और पहले से ही पूर्वाग्रह बना लिया था।
अदालत ने यह भी कहा कि आयोग को दंड लगाने से पहले स्पष्ट कारण दर्ज करने चाहिए, जिससे यह साबित हो कि अधिकारी की मंशा गलत थी।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि आयोग की सिफारिशें बाध्यकारी आदेश की तरह नहीं हो सकतीं और वह प्रशासनिक अधिकारों से ऊपर नहीं जा सकता।
अदालत ने कहा,
“रिकॉर्ड से यह कहीं साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर सूचना देने में देरी की या गलत मंशा से काम किया।”
अंत में हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश को मनमाना और पूर्वाग्रह से प्रभावित बताते हुए रद्द किया और याचिकाकर्ता को राहत दी।