कस्टडी मांगने वाली हेबियस कॉर्पस याचिका पर 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' की रोक नहीं, बच्चे के हित में रिट जारी की जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिंगल जज का आदेश रद्द किया, जिसमें एक मां की हेबियस कॉर्पस याचिका खारिज की गई थी। इस याचिका में मां ने पिता से अपने बच्चे की कस्टडी मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि मां की याचिका को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत उसके पास दूसरा कानूनी उपाय मौजूद था।
ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर यह बच्चे के सबसे अच्छे हित में हो तो रिट कोर्ट अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल कर सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि यह है कि मां ने एक हेबियस कॉर्पस याचिका के ज़रिए सिंगल जज से संपर्क किया। मां ने दावा किया कि उसके 20 महीने के बच्चे को पिता ने "ज़बरदस्ती छीन लिया"। मां ने बताया कि 'बाल कल्याण समिति' ने 10.09.2025 को एक आदेश जारी किया, जिसमें पिता को बच्चे की कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया गया था, लेकिन पिता ने ऐसा नहीं किया।
सिंगल जज ने मां की याचिका खारिज की थी। उन्होंने कहा था कि अगर किसी नाबालिग को उसके कानूनी अभिभावक से गलत तरीके से अलग कर दिया गया हो तो उसकी कस्टडी वापस दिलाने के लिए रिट जारी की जा सकती है; लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि पिता के पास नाबालिग की कस्टडी अवैध या अनुचित थी।
सिंगल जज ने कहा था,
"कस्टडी के अधिकारों के मुद्दे पर दोनों पक्षों के पास यह विकल्प खुला है कि वे कानून के अनुसार इन अधिकारों का निर्धारण करवाने के लिए उचित मंच (फोरम) से संपर्क करें।"
सिंगल जज के आदेश के संबंध में चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की एक डिवीज़न बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले 'यशिका साहू बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2020)' पर भरोसा जताया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले में यह कहा था:
"अब यह तर्क देना बहुत पुराना हो चुका है कि अगर बच्चा किसी दूसरे अभिभावक की कस्टडी में हो तो हेबियस कॉर्पस की रिट सुनवाई योग्य नहीं है। कोर्ट बच्चे के सबसे अच्छे हित के लिए अपने असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल कर सकती है। इस संबंध में कानून समय के साथ काफी विकसित हुआ। अब यह एक स्थापित स्थिति है कि कोर्ट बच्चे के सबसे अच्छे हित के लिए अपने असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल कर सकती है।"
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माँ की इस दलील को खारिज कर दिया कि पिता की हेबियस कॉर्पस रिट याचिका राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई योग्य नहीं थी।
इसलिए हाईकोर्ट ने कहा:
"हम पाते हैं कि अपीलकर्ता नंबर 1 का अपने नाबालिग बेटे की कस्टडी पाने का दावा, जिसकी उम्र अब लगभग 20 महीने है, रिट कोर्ट द्वारा मेरिट के आधार पर नहीं माना गया और माननीय सिंगल जज की राय यह है कि 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890' के तहत उपाय उपलब्ध होने के कारण हेबियस कॉर्पस की याचिका या तो सुनवाई योग्य नहीं है या रिट कोर्ट इसके लिए उचित मंच नहीं है... कस्टडी के मामलों में, बच्चे का कल्याण ही सबसे महत्वपूर्ण बात होती है - कानून के इस स्थापित सिद्धांत पर फैसले का हवाला देने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक बार जब हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि रिट याचिका को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह सुनवाई योग्य नहीं है या रिट कोर्ट का मंच उचित नहीं है तो मामले पर रिट कोर्ट द्वारा मेरिट के आधार पर विचार किया जाना चाहिए, जहां दोनों पक्षों को अपनी पूरी बात कहने का मौका मिलेगा।"
डिवीजन बेंच ने 02.02.2026 को राज्य के सरकारी वकील को निर्देश प्राप्त करने के लिए समय दिया कि CWC के निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया गया।
25.02.2026 को अगली सुनवाई में निर्देश प्राप्त हुए, जिनसे पता चला कि SHO हल्दी, बलिया ने पालन न होने के संबंध में पुलिस अधीक्षक, बलिया को एक रिपोर्ट दी थी; जिसके आधार पर SP बलिया ने SP जौनपुर को एक पत्र लिखकर आवश्यक कदम उठाने को कहा।
तब हाई कोर्ट ने टिप्पणी की,
"यह आश्चर्यजनक है कि इस कोर्ट द्वारा आदेश पारित किए जाने के बावजूद, अधिकारी एक-दूसरे को पत्र लिखने में व्यस्त हैं और बच्चा, बाल कल्याण समिति द्वारा पारित आदेश के विपरीत पुलिस लाइंस, जौनपुर में है।"
अपने अगले आदेश, दिनांक 11.03.2026 में कोर्ट ने SSP जौनपुर और SHO, पुलिस थाना हल्दी, बलिया की रिपोर्टों का संज्ञान लिया और कहा:
"दोनों रिपोर्ट कोर्ट की इस बात/राय को पक्का करती हैं कि रेस्पोंडेंट नंबर 6, पुलिस कांस्टेबल के अधिकारी, C.W.C. के निर्देशों का उल्लंघन करने में उस रेस्पोंडेंट नंबर 6 (पिता) को पूरा बचाव दे रहे हैं, अधिकारियों का यह व्यवहार सही नहीं है और मुख्य मामले से निपटते समय इस बारे में सही आदेश दिए जाएंगे।"
25.03.2026 को पिता की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि पिता ने CWC के आदेश को चुनौती दी और अपील पेंडिंग है। वकील ने नाबालिग बच्चे की कस्टडी को लेकर अपनी चिंता जताई थी और कहा था कि वह अपने क्लाइंट को परिवार के हित में काम करने के लिए मनाने की कोशिश करेंगे।
03.04.2026 को सुनवाई के दौरान पिता के वकील ने कहा कि कोर्ट पार्टियों के बीच शादी के झगड़े को मीडिएशन और सुलह के ज़रिए आपसी सहमति से सुलझाने की संभावना तलाश सकता है ताकि वे एक साथ बैठकर समझौते की शर्तों पर विचार कर सकें। उन्होंने यह भी कहा कि उनका क्लाइंट मां को तलाक देना चाहता है। हालांकि अभी तक ऐसी कोई कार्रवाई शुरू नहीं हुईं।
सिंगल जज का आदेश रद्द करते हुए डिवीज़न बेंच ने मां की हेबियस कॉर्पस याचिका बहाल की।
इसने निर्देश दिया कि हेबियस कॉर्पस को 16.04.2026 को एक "फ्रेश केस" के तौर पर सही बेंच के सामने लिस्ट किया जाएगा।
Case Title: Smt. Rinku Ram @ Rinku Devi and another v. State of U.P. and 7 others