हाईकोर्ट का यूपी कोर्ट्स को निर्देश: अगर 'दहेज हत्या' का मामला हत्या जैसा लगे तो मुख्य आरोप हत्या का और वैकल्पिक आरोप दहेज हत्या का तय करें

Update: 2026-07-14 04:53 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सभी निचली अदालतों (ट्रायल कोर्ट) को एक ज़रूरी निर्देश जारी किया। निर्देश के मुताबिक, अगर जांच के दौरान मिले सबूतों से पता चलता है कि ससुराल में हुई मौत 'हत्या' (homicidal) थी, तो मुख्य आरोप IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत और वैकल्पिक आरोप IPC की धारा 304-B ​​(दहेज हत्या) के तहत तय किया जाना चाहिए।

जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-II की बेंच ने यह निर्देश ऐसे मामले पर नाराज़गी जताते हुए जारी किया, जिसमें जांच अधिकारी और ट्रायल कोर्ट के जज दोनों ने हत्या के मामले को सिर्फ़ धारा 304-B ​​के तहत देखा। उन्होंने मरने से पहले दिए गए बयान (dying declaration) की बातों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया, जिसमें साफ़ तौर पर हत्या का आरोप लगाया गया।

हालांकि, कोर्ट ने 1988 में एक व्यक्ति की पत्नी की मौत के मामले में उसे दोषी ठहराने और उम्रकैद की सज़ा सुनाने के फ़ैसले को रद्द कर दिया। बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष क्रूरता की कोई खास घटना या पत्नी की मौत से ठीक पहले दहेज के लिए परेशान करने और मौत के बीच कोई "सीधा और मज़बूत संबंध" (proximate and live link) साबित करने में नाकाम रहा।

मामले का संक्षिप्त विवरण

शिकायतकर्ता (मृतक महिला के पिता) ने 1 मार्च 1988 को अपीलकर्ता-आरोपी चंद्र भान (मृतक का पति) और तीन अन्य लोगों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बेटी को स्कूटर या ₹10,000 की दहेज की मांग पूरी न होने पर शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया और जलाकर मार डाला गया।

हालांकि FIR IPC की धारा 302 के तहत दर्ज की गई, लेकिन चार्जशीट IPC की धारा 304-B, 498-A और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दाखिल की गई, जिस पर ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लिया। बाद में आरोप सिर्फ़ IPC की धारा 498-A और 304-B ​​के तहत तय किए गए।

आखिरकार, 4 अक्टूबर 1989 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी-अपीलकर्ताओं चंद्र भान और जयराम को IPC की धारा 304-B ​​के तहत दोषी ठहराया और उम्रकैद की सज़ा सुनाई। हालांकि, अपील लंबित रहने के दौरान, सह-आरोपी जयराम की मृत्यु हो गई, इसलिए कार्यवाही केवल जीवित अपीलकर्ता-पति (चंद्र भान) के लिए जारी रही।

अपनी अपील में अपीलकर्ता-आरोपी ने तर्क दिया कि मृत्यु से कुछ समय पहले दहेज की अतिरिक्त मांग पूरी न होने के कारण क्रूरता का कोई सबूत नहीं था। साथ ही अभियोजन पक्ष IPC की धारा 304-B ​​के आवश्यक तत्वों को साबित करने में विफल रहा था।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

अपील पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने नवंबर 1987 में मृतका द्वारा अपने पिता को लिखे गए एक पत्र का अध्ययन किया, जिसने अभियोजन पक्ष के दहेज के सिद्धांत को पूरी तरह से गलत साबित किया।

पत्र से पता चला कि मृतका बहुत परेशान थी क्योंकि उसका पति अक्सर अपनी विधवा भाभी के घर पर रहता था। कोर्ट ने पाया कि विवाद का असली कारण मृतका को अवैध संबंध का शक होना था, न कि दहेज की मांग।

हाईकोर्ट ने माता-पिता (PW-1 और PW-2) के बयानों का बारीकी से विश्लेषण किया और पाया कि दहेज की मांग के बारे में उनके आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे, जिनमें मृतका के साथ क्रूरता या उत्पीड़न की किसी भी घटना का कोई विशिष्ट विवरण नहीं दिया गया।

बेंच ने कहा कि दहेज की मांग करना एक बात है, लेकिन दहेज के लिए क्रूरता करना बिल्कुल अलग बात है।

करण सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने कहा:

"धारा 113-B लागू करने के लिए भी अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी द्वारा मृतका की मृत्यु से कुछ समय पहले दहेज की किसी मांग के लिए या उससे संबंधित क्रूरता या उत्पीड़न किया गया। जब तक अभियोजन पक्ष द्वारा यह दायित्व पूरा नहीं किया जाता, तब तक साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-B के तहत अनुमान लागू नहीं किया जा सकता है।"

बेंच ने कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि दहेज की कोई मांग थी। फिर भी अभियोजन पक्ष यह साबित करने में बुरी तरह विफल रहा है कि उक्त दहेज की मांग कभी मृतका की मृत्यु से कुछ समय पहले की गई।

कोर्ट ने पाया कि झगड़े का आखिरी कथित मामला अक्टूबर 1987 में हुआ था, जबकि मौत फरवरी 1988 के आखिर में हुई। इस समय के अंतर ने ज़रूरी "सीधे और मज़बूत संबंध" (proximate and live link) को खत्म कर दिया, जिससे आरोप पुराने और कमज़ोर पड़ गए।

बेंच ने कहा,

"...मृतक की मौत और अपीलकर्ताओं द्वारा दहेज की मांग के लिए की गई क्रूरता या उत्पीड़न के बीच कोई सीधा और मज़बूत संबंध नहीं है... इसलिए हमारी राय है कि कथित उत्पीड़न, यदि कोई था, तो उसका मृतक की मौत और दहेज की मांग के लिए उसके उत्पीड़न के बीच कोई सीधा और मज़बूत संबंध नहीं था, क्योंकि उसकी मौत 1.3.1988 को हुई।"

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मृतक का मरते समय दिया गया बयान (dying declaration), जिसमें दावा किया गया था कि उसके पति और ससुराल वालों ने उस पर केरोसिन डाला था, आसपास की परिस्थितियों के कारण बहुत संदिग्ध हो गया था, जिससे वह "शक से परे" नहीं रह गया।

बेंच ने मेडिकल रिकॉर्ड पर भी ध्यान दिया, जिनसे पता चला कि पति के हाथों और चेहरे पर खुद 15% जलने के निशान थे।

बेंच ने कहा कि इस बात की ज़्यादा संभावना है कि अपीलकर्ता, आरोपी चंद्र भान, ने अपनी पत्नी को जलते हुए देखकर उसे बचाने की कोशिश की हो।

इसके अलावा, पति भागा नहीं; वह खुद मृतक को अस्पताल ले गया और जब शिकायतकर्ता पहुँचा तो वह वहाँ मौजूद था।

महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकोर्ट ने देखा कि हालाँकि मरते समय दिए गए बयान में हत्या की ओर इशारा किया गया, लेकिन अपीलकर्ता को सीधे तौर पर IPC की धारा 302 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

बेंच ने कहा,

"अपीलकर्ता-आरोपी पर IPC की धारा 302 के तहत मुकदमा नहीं चलाया गया। यहां तक कि CrPC की धारा 313 के तहत दर्ज उसके बयान में अपीलकर्ता-आरोपी से मृतक पर केरोसिन तेल डालकर और फिर उसे जलाकर हत्या करने के बारे में कोई सवाल भी नहीं पूछा गया।"

कोर्ट ने शमसाहब एम. मुल्तानी बनाम कर्नाटक राज्य (2001) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि IPC की धारा 302 एक अलग और ज़्यादा गंभीर अपराध है, न कि CrPC की धारा 222 के तहत धारा 304-B ​​से जुड़ा या "मामूली अपराध"। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चूंकि IPC की धारा 302 के तहत कोई आरोप तय नहीं किया गया और घटना 1988 की, इसलिए सही आरोप तय करने के बाद अपीलकर्ता पर दोबारा मुक़दमा चलाने के लिए मामले को निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में वापस भेजना उचित नहीं होगा।

नतीजतन, अपील मंज़ूर कर ली गई और जीवित अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

हालांकि, प्रक्रियात्मक खामियों को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने राज्य के न्यायिक अधिकारियों के लिए निम्नलिखित स्पष्ट निर्देश जारी किए:

1. ट्रायल कोर्ट को आरोप तय करने से पहले जांच के दौरान इकट्ठा किए गए प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य सबूतों का बारीकी से मूल्यांकन करना चाहिए।

2. अगर ससुराल में हत्या से मौत का संकेत देने वाली शुरुआती सामग्री (prima facie material) मौजूद है तो ट्रायल कोर्ट का यह कर्तव्य है कि वह IPC की धारा 302 के 3. तहत मुख्य आरोप और IPC की धारा 304-B ​​के तहत वैकल्पिक आरोप तय करे।

हालांकि धारा 302 को जोड़ना यांत्रिक (बिना सोचे-समझे) नहीं होना चाहिए, लेकिन जब भी हत्या का स्पष्ट मामला बनता है, तो इस पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य में न्याय में होने वाली चूक को रोकने के लिए इस फ़ैसले की एक प्रति रजिस्ट्रार (अनुपालन) के माध्यम से उत्तर प्रदेश राज्य के सभी न्यायिक अधिकारियों को भेजी जाए।

Case Title: Chandra Bhan and another vs State of UP 2026 LiveLaw (AB) 405

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