माँ की मृत्यु के बाद पिता ही स्वाभाविक अभिभावक होता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि माँ की मृत्यु के बाद पिता ही स्वाभाविक अभिभावक होता है और आमतौर पर नाबालिग के कल्याण की देखभाल करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति होता है।
जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने इस प्रकार एक पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus) याचिका स्वीकार की और 13 महीने के बच्चे के ननिहाल पक्ष के रिश्तेदारों को निर्देश दिया कि वे बच्चे की कस्टडी याचिकाकर्ता को सौंप दें।
याचिकाकर्ता-पिता का पक्ष यह था कि उसकी पत्नी (बच्चे की माँ) की मृत्यु पिछले साल फरवरी में हो गई, और तब से उसका बेटा (बच्चा) अपनी नानी और मामा की कस्टडी में है। यह तर्क दिया गया कि वह स्वाभाविक और कानूनी अभिभावक होने के नाते, नाबालिग की कस्टडी का हकदार है।
आगे यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता आर्थिक रूप से सक्षम है और नाबालिग का भरण-पोषण करने तथा उसकी उचित परवरिश सुनिश्चित करने में पूरी तरह समर्थ है। अंत में, उसने यह भी बताया कि उसकी बहन, जो उसके घर के पास ही रहती है, एक गृहिणी है और नाबालिग की देखभाल में मदद करने के लिए उपलब्ध है।
दूसरी ओर, नानी और मामा ने यह तर्क दिया कि नाबालिग की देखभाल करने की उसकी क्षमता को लेकर संदेह हैं, क्योंकि उसकी पत्नी की मृत्यु एक असफल IVF प्रक्रिया के दौरान हुई थी, जिससे उसके आचरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
आगे यह भी कहा गया कि बच्चा (Corpus) इस समय नानी की देखभाल में है, जो बच्चे की देखभाल करने के लिए पूरी तरह सक्षम है, विशेष रूप से यह देखते हुए कि बच्चा समय से पहले (Premature) पैदा हुआ था और उसे विशेष देखभाल की आवश्यकता है।
पीठ ने शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—तेजस्विनी गौड़ बनाम शेखर जगदीश प्रसाद तिवारी (2019) और गौतम कुमार दास बनाम NCT दिल्ली और अन्य (2024)—का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की कि किसी रिश्तेदार को नाबालिग बच्चे की अस्थायी कस्टडी देना, स्वाभाविक अभिभावक को नाबालिग बच्चे की कस्टडी मांगने से नहीं रोकता है।
Case title - Akshit Pandey (Minor) And Another vs. State Of U.P. And 6 Others 2026 LiveLaw (AB) 238