पेमेंट में देरी के आधार पर मील की ज़रूरत से कम गन्ना आवंटित करना सही नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मील की अनुमानित ज़रूरत से कम गन्ना आवंटित करने के भेदभावपूर्ण फ़ैसले को कम गन्ना उठाने या गन्ना मूल्य के भुगतान में कथित देरी के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब कम आवंटन के कारण ही कम गन्ना उठाया गया और मिल की भुगतान करने की क्षमता प्रभावित हुई।
कोर्ट ने यह भी कहा कि गन्ना आवंटन करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि सप्लाई किए गए गन्ने का केवल 60% ही अंततः पेराई के लिए उपलब्ध होता है, जबकि बाकी 40% चोरी और अन्य नुकसानों में चला जाता है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने बदायूं ज़िले में चीनी मील चलाने वाली यदु शुगर लिमिटेड द्वारा दायर रिट याचिका को मंज़ूरी देते हुए ये टिप्पणियां कीं।
कोर्ट ने गन्ना आयुक्त को निर्देश दिया कि वे 2026-27 पेराई सीज़न के लिए मील की अनुमानित ज़रूरत के अनुसार गन्ना आवंटित करें और 180 दिनों के सीज़न के लिए निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करें।
कोर्ट ने कहा,
"...पेराई सीज़न के लिए अनुमानित गन्ना ज़रूरत की तुलना में कम आवंटन के कारण याचिकाकर्ता को कम गन्ना उठाने के प्रतिशत पर मजबूर होना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप चीनी मील बंद हो गई। इस प्रकार, राज्य प्रशासन का अन्य चीनी मिलों को गन्ना फिर से आवंटित करना उचित नहीं है। इस प्रकार, आवंटन की तुलना में याचिकाकर्ता को बहुत कम गन्ना मिलना चीनी मील के बंद होने का मूल कारण है। ऐसे में अन्य सात चीनी मीलों की तुलना में याचिकाकर्ता के साथ भेदभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।"
मील की स्थापित पेराई क्षमता 7,000 टन प्रतिदिन है। यूपी गन्ना (आपूर्ति और खरीद का नियमन) अधिनियम, 1953 की धारा 12(2) के तहत 2020 और 2025 में जारी मेमोरेंडम के तहत इसकी अनुमानित गन्ना ज़रूरत 100.80 लाख क्विंटल तय की गई। हालांकि, 2025-26 सीज़न के लिए इसे केवल 51.30 लाख क्विंटल आवंटित किया गया और 26 जनवरी, 2026 को कामकाज बंद होने से पहले 9.17 लाख क्विंटल की खरीद की गई।
याचिकाकर्ता ने भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि इलाके की सात अन्य चीनी मीलों को उनकी अनुमानित ज़रूरतों से ज़्यादा आवंटन मिला। उदाहरण के लिए, मझवली को उसकी अनुमानित ज़रूरत का 190.92% मिला, जबकि याचिकाकर्ता को केवल 50.89% मिला।
राज्य ने कम आवंटन का बचाव करते हुए याचिकाकर्ता द्वारा कम खरीद और गन्ने की कीमत का भुगतान करने में देरी का हवाला दिया। राज्य का तर्क था कि मील को आवंटित 51.30 लाख क्विंटल का भी पूरा इस्तेमाल न कर पाना यह दिखाता है कि वह अपनी क्रशिंग क्षमता के हिसाब से काम नहीं कर रही थी। राज्य का यह भी कहना था कि गन्ना आयुक्त को चीनी मीलों और गन्ना किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाना था, खासकर किसानों के समय पर भुगतान पाने के अधिकार के मामले में।
इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आवंटन और असल खरीद की तुलना दूसरी मीलों से की। मझवली को अपनी अनुमानित ज़रूरत का 190.92% मिलने के बावजूद, उसने 36.32% खरीद की, जबकि याचिकाकर्ता ने केवल 50.89% मिलने के बावजूद 17.88% खरीद की। जब आंकड़ों का आकलन आवंटित मात्रा के अनुपात में किया गया तो कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की खरीद असल में ज़्यादा थी।
कोर्ट ने यह भी माना कि 51.30 लाख क्विंटल का आवंटन मिल को 180 दिन के क्रशिंग सीज़न में केवल लगभग 102.6 दिनों तक ही चला सकता था, जिससे वह लगभग 80 दिनों तक काम नहीं कर पाती। कोर्ट ने गौर किया कि गन्ने की कमी के कारण बर्बाद हुए घंटे (786.19 घंटे), मिल के असल क्रशिंग घंटों (784.44 घंटे) से ज़्यादा थे।
कोर्ट ने कहा,
"राज्य का यह कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि आवंटन अनुमानित ज़रूरत के हिसाब से हो, ताकि चीनी मिल खुद को चला सके और गन्ना आयुक्त की 60% खरीद हासिल करने की उम्मीद के मुताबिक नतीजे भी दे सके।"
फ़ैसला सुनाने से पहले कोर्ट ने सरकार को एक बात याद दिलाई:
“यह कोर्ट सरकार को, जो एक कल्याणकारी राज्य का प्रतिनिधित्व करती है, यह याद दिलाना चाहता है कि टिकाऊ विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) का तरीका अपनाना आज की ज़रूरत है। इसलिए सरकार की नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जिनसे मौजूदा मिलें चलती रहें और साथ ही नई मिलें लगाने के रास्ते भी खुलें।”
रिट याचिका मंज़ूर कर ली गई।
Case Title: Yadu Sugar Limited v. State of UP and another