26 साल बाद भूमि आवंटन रद्द करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिवार के हक में बहाल की ज़मीन
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 26 साल बाद कृषि भूमि का आवंटन रद्द किए जाने के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 198(4) के तहत इतने लंबे अंतराल के बाद शुरू की गई कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने कहा कि जब आवंटी को बाद में हस्तांतरणीय अधिकारों वाला भूमिधर भी दर्ज किया जा चुका था, तब निजी शिकायत पर 26 साल बाद आवंटन रद्द करने की कार्यवाही नहीं की जा सकती।
जस्टिस चंद्र कुमार राय ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि संबंधित जमीन का आवंटन वर्ष 1987 में हुआ। उसके बाद याची के पिता को पहले गैर-हस्तांतरणीय अधिकारों वाला भूमिधर और बाद में हस्तांतरणीय अधिकारों वाला भूमिधर दर्ज किया गया। इसके बावजूद वर्ष 2013 में आवंटन रद्द करने की कार्यवाही शुरू की गई, यानी आवंटन के करीब 26 साल बाद। कोर्ट ने इस देरी को कानून की प्रक्रिया का पूरी तरह दुरुपयोग करार दिया।
मामला हाथरस जिले का है। याची के पिता और एक अन्य व्यक्ति को फरवरी 1987 में प्लॉट संख्या 624 का आवंटन किया गया। राजस्व अभिलेखों में यह जमीन बंजर दर्ज थी। यह आवंटन सरकार की परिवार नियोजन योजना में भाग लेने के आधार पर किया गया। आवंटन के बाद दोनों आवंटियों के नाम पहले गैर-हस्तांतरणीय अधिकारों वाले भूमिधर के रूप में दर्ज किए गए और बाद में उन्हें हस्तांतरणीय अधिकारों वाला भूमिधर दर्ज कर दिया गया।
करीब 26 साल बाद वर्ष 2013 में एक निजी शिकायत के आधार पर अधिनियम की धारा 198(4) के तहत आवंटन रद्द करने की कार्यवाही शुरू की गई। हाथरस के कलेक्टर ने 1 जुलाई 2015 को आवंटन रद्द कर दिया। इसके खिलाफ याची ने धारा 333 के तहत पुनरीक्षण दाखिल किया, लेकिन अलीगढ़ क्षेत्र के अपर आयुक्त न्यायिक-द्वितीय ने 29 अगस्त 2016 को पुनरीक्षण खारिज कर दिया। इसके बाद याची ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया।
याची की ओर से दलील दी गई कि 26 साल बाद शुरू की गई कार्यवाही स्पष्ट रूप से गैरकानूनी और मनमानी है। यह भी कहा गया कि उसके पिता को सरकार की परिवार नियोजन योजना में भाग लेने के कारण जमीन का आवंटन किया गया था और इस आधार पर भी आवंटन को इतने लंबे समय बाद रद्द नहीं किया जा सकता।
वहीं राज्य सरकार और प्रतिवादी संख्या चार की ओर से दलील दी गई कि संबंधित जमीन राजस्व अभिलेखों और चकबंदी के अभिलेख सीएच फॉर्म 45 में खलिहान के रूप में दर्ज थी। उनका कहना था कि जमीन की प्रकृति को बदलकर उसे बंजर नहीं किया जा सकता और वर्ष 1987 के आवंटन से याची के पक्ष में कोई अधिकार पैदा नहीं हुआ।
इस आधार पर यह भी तर्क दिया गया कि अधिनियम की धारा 198(6) में निर्धारित समयसीमा इस मामले में लागू नहीं होगी। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के बाबू सिंह बनाम चकबंदी अधिकारी एवं अन्य के फैसले का हवाला दिया गया।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने ऋषि पाल एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अधिनियम में निर्धारित अवधि के बाद की गई शिकायत समयसीमा से बाधित होती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समयसीमा का सवाल मामले की जड़ से जुड़ा होता है और यदि निचली अदालत या प्राधिकारी के सामने इस आधार को नहीं उठाया गया हो, तब भी इसे हाईकोर्ट के समक्ष उठाया जा सकता है।
अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि धारा 198(6) में आवंटन रद्द करने की कार्यवाही शुरू करने के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित है। 10 नवंबर 1980 से पहले किए गए आवंटन के मामलों में उस तारीख से सात साल के भीतर नोटिस जारी किया जाना जरूरी है, जबकि 10 नवंबर 1980 या उसके बाद के आवंटन के लिए आवंटन या पट्टे की तारीख से पांच साल के भीतर या 10 नवंबर 1987 तक, जो भी बाद में हो, नोटिस जारी किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने जितेंद्र कुमार उर्फ गोपाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में अदालत ने माना कि जब किसी आवंटी को हस्तांतरणीय अधिकारों वाला भूमिधर दर्ज किए जाने का आदेश हो चुका हो, तो बाद में आवंटन रद्द किए जाने के बावजूद उस अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने कहा कि याची के पिता को सरकार की परिवार नियोजन योजना में भाग लेने के कारण जमीन आवंटित की गई। ऐसे में निजी शिकायत पर शुरू की गई अत्यधिक विलंबित कार्यवाही के आधार पर आवंटन रद्द नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब आवंटी पहले ही हस्तांतरणीय अधिकारों वाला भूमिधर बन चुका था।
कोर्ट ने बाबू सिंह मामले में दिए गए फैसले को भी इस मामले के तथ्यों पर लागू होने से अलग किया। अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले की परिस्थितियां अलग हैं, क्योंकि यहां आवंटी को हस्तांतरणीय अधिकारों वाला भूमिधर दर्ज किया जा चुका था और मूल आवंटन सरकार की अपनी योजना में भाग लेने के आधार पर किया गया।
हाईकोर्ट ने कलेक्टर, हाथरस और अपर आयुक्त के आदेशों को रद्द किया और याचिका स्वीकार करते हुए अधिकारियों को संबंधित प्लॉट के अभिलेख में याची के नाम की प्रविष्टि तत्काल दुरुस्त करने का निर्देश दिया। कोर्ट के इस फैसले से 26 साल बाद रद्द किए गए जमीन के आवंटन को लेकर याची के परिवार का अधिकार फिर बहाल हो गया।