बुनकर की मौत उनकी विधवा को हाउसिंग कॉलोनी का क्वार्टर देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती, बुनाई एक पुश्तैनी कला: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-08 14:03 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने खुद बुनकर कॉलोनी में रह रहे बुनकरों को क्वार्टर ट्रांसफर करने का फैसला किया, तो बुनकर की मौत उनकी विधवा को वही अधिकार देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती।

यह देखते हुए कि भारत में बुनाई एक पुश्तैनी कला है, जो अगली पीढ़ी को मिलती है, कोर्ट ने कहा कि परिवार के मुखिया की मौत के बाद बुनकर के परिवार को कॉलोनी से बेदखल नहीं किया जा सकता।

जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने कहा,

“जब सरकार ने खुद वहां रह रहे बुनकरों को क्वार्टर ट्रांसफर करने का फैसला किया, तो बुनकर पति की मौत उनकी विधवा को वही अधिकार देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती। भारत में बुनकरों के परिवार में सभी सदस्य बुनाई का काम करते हैं और बुनाई एक पुश्तैनी कला है जो अगली पीढ़ी को मिलती है। हम परिवार के मुखिया की मौत के बाद बुनकर के परिवार के सदस्यों को कॉलोनी से बेदखल करके इस कला को खत्म नहीं होने दे सकते।”

याचिकाकर्ता के पति को रेशम बुनकरों के लिए शुरू की गई राज्य-प्रायोजित हाउसिंग स्कीम के तहत वाराणसी जिले की नटी इमली (लेबर कॉलोनी चौराहा) स्थित बुनकर कॉलोनी में क्वार्टर नंबर 3 अलॉट किया गया। वे वहां रहते थे और लगातार क्वार्टर का किराया देते रहे। उनकी मौत के बाद उनकी विधवा होने के नाते याचिकाकर्ता को वहां रहने का अधिकार मिला। दो लोगों ने जबरदस्ती क्वार्टर के एक छोटे से हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया।

याचिकाकर्ता की शिकायत और अर्जी पर वाराणसी के असिस्टेंट डायरेक्टर (हैंडलूम और टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज) ने कब्ज़ा करने वाले दो लोगों को जगह खाली करने का नोटिस जारी किया। पहले की रिट याचिकाओं में हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद असिस्टेंट डायरेक्टर ने 18.10.2014 के आदेश में कहा कि क्वार्टर मूल रूप से याचिकाकर्ता के पति को अलॉट किया गया और कब्ज़ा करने वाले दोनों लोग बिना अधिकार के वहां रह रहे थे (trespassers थे)। हाईकोर्ट ने इस आदेश के खिलाफ उनकी चुनौती खारिज की और 2015 में पुलिस की मदद से कब्ज़ा की गई जगह को खाली कराकर सील कर दिया गया।

हालांकि, खाली कराई गई जगह याचिकाकर्ता को वापस नहीं दी गई। उन्होंने क्वार्टर के बंद हिस्से का कब्ज़ा पाने और इसके लिए अपनी अर्जी पर फैसला लेने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। कोर्ट ने कहा कि काउंटर एफिडेविट में लिया गया यह रुख कि याचिकाकर्ता के पति के नाम पर कभी कोई अलॉटमेंट जारी नहीं किया गया, उसी रैंक के एक अधिकारी द्वारा 18.10.2014 को जारी बेदखली के आदेश के खिलाफ था। कोर्ट ने असिस्टेंट डायरेक्टर को निर्देश दिया कि वे कॉलोनी के सभी अलॉटीज़ की अलॉटमेंट लिस्ट एफिडेविट के साथ कोर्ट के सामने पेश करें, ऐसा न करने पर उन्हें खुद पेश होना था।

चूंकि राज्य सरकार लिस्ट पेश करने में नाकाम रही, इसलिए कोर्ट ने कहा,

“इस कोर्ट के पास राज्य के रुख के खिलाफ़ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने और 18.10.2014 के आदेश में स्वर्गीय मती उल्लाह (याचिकाकर्ता के पति) के अलॉटमेंट के बारे में बताई गई बात को सही मानने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है, जो इस कोर्ट के सामने कई दौर की कानूनी कार्यवाही के बाद भी सही बनी रही।”

कोर्ट ने कहा कि 1996 में कॉलोनी में रहने वालों की पहचान के लिए बनाई गई कमेटी ने खुद याचिकाकर्ता के पति को अपनी लिस्ट में सीरियल नंबर 3 पर रखकर उन्हें वैध निवासी माना था। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य ने पहले की कानूनी कार्यवाही में कभी भी वैध अलॉटी की पत्नी के तौर पर याचिकाकर्ता की हैसियत पर सवाल नहीं उठाया था।

“जब अलॉटमेंट पर कोई विवाद नहीं था तो अधिकारियों के लिए क्वार्टर के किसी भी हिस्से का कब्ज़ा रोके रखने का कोई औचित्य नहीं था, खासकर अनधिकृत निवासियों को बेदखल करने के बाद। कब्ज़ा रोके रखना पूरी तरह से गैर-कानूनी, मनमाना और बिना किसी कानूनी अधिकार के है।”

यह मानते हुए कि प्रतिवादियों को अपने ही रिकॉर्ड और आदेशों के खिलाफ़ काम करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती, कोर्ट ने रिट याचिका को मंज़ूरी दी और असिस्टेंट डायरेक्टर को निर्देश दिया कि वे क्वार्टर के बंद हिस्से का कब्ज़ा तुरंत याचिकाकर्ता को सौंप दें। साथ ही स्वर्गीय मती उल्लाह (याचिकाकर्ता के पति) की उत्तराधिकारी के तौर पर उनके पक्ष में ट्रांसफर डीड निष्पादित करने का भी निर्देश दिया गया।

Case Title: Kamrunnisha v. State of U.P. and 3 others

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