अगर ट्रायल के दौरान पीड़ित पक्ष बदल ले तो सिर्फ़ CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए बयान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने कहा कि अगर ट्रायल के दौरान पीड़ित और अभियोजन पक्ष के अन्य गवाह अपनी बात से मुकर जाते हैं (होस्टाइल हो जाते हैं) तो आरोपी को सिर्फ़ CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अपहरण के मामले में 2011 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सज़ा रद्द करते हुए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने कहा कि चूंकि CrPC की धारा 164 के तहत बयान आरोपी की मौजूदगी में दर्ज नहीं किया जाता है, इसलिए उसे गवाह से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए आरोपी को दोषी ठहराने के लिए इस बयान पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
मामले का संक्षिप्त विवरण
11 मार्च 2009 को एक पिता ने FIR दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता (लाल बाबू) और उसके भाई ने मारुति कार में उनकी 14 साल की बेटी का अपहरण कर लिया था। अगले दिन पीड़ित लड़की अपीलकर्ता के साथ मिली।
पीड़ित की मेडिको-लीगल जांच रिपोर्ट में उसके शरीर के किसी भी हिस्से, यहां तक कि उसके प्राइवेट पार्ट्स पर भी चोट का कोई निशान नहीं मिला और रेडियोलॉजिकल जांच से उसकी उम्र लगभग 16 साल आंकी गई।
CrPC की धारा 164 के तहत अपने बयान में पीड़ित ने आरोपी के खिलाफ गवाही दी और अपहरण के मामले में अभियोजन पक्ष का समर्थन किया।
हालांकि, ट्रायल के दौरान, शिकायतकर्ता (पिता), छोटी बहन (जिसने कथित तौर पर अपहरण होते देखा था) और खुद पीड़ित सहित सभी मुख्य गवाह अपनी बात से मुकर गए।
पीड़ित ने ट्रायल कोर्ट के सामने गवाही दी कि वह गुस्से में घर छोड़कर एक रिश्तेदार के पास चली गई और उसने अपहरण की बात से साफ इनकार किया। उसने यह भी कहा कि CrPC की धारा 164 के तहत उसका पिछला बयान पुलिस के दबाव में दिया गया।
इसके बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराया। चार्जशीट और पीड़ित के CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए बयान के आधार पर कोर्ट ने अपीलकर्ता को पांच साल की जेल की सज़ा सुनाई।
ट्रायल कोर्ट ने माना कि गवाह शायद "सामाजिक दबाव" और परिवार की इज़्ज़त बचाने के कारण अभियोजन पक्ष के बयान से मुकर गए।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
हालांकि, आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस तरीके को "कानून की स्पष्ट गलती" (patent error of law) करार दिया, जिसके तहत अपीलकर्ता को सिर्फ़ पीड़ित के उस बयान के आधार पर दोषी ठहराया गया, जो CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज किया गया, लेकिन बाद में कोर्ट में शपथ पर हुई पूछताछ के दौरान वह अपने उस बयान से मुकर गई।
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आपराधिक कानून के तहत अभियोजन पक्ष (Prosecution) के लिए ज़रूरी है कि वह आरोपी की मौजूदगी में दर्ज सबूतों के आधार पर बिना किसी उचित संदेह के अपना केस साबित करे।
CrPC की धारा 273 का ज़िक्र करते हुए बेंच ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में सभी सबूत आरोपी की मौजूदगी में दर्ज किए जाने चाहिए ताकि उन्हें जिरह (Cross-Examination) के ज़रिए बयानों की सच्चाई परखने का उचित मौका मिल सके।
बेंच ने कहा कि CrPC की धारा 164 के तहत बयान मजिस्ट्रेट द्वारा जांच के चरण में दर्ज किया जाता है, न कि मुकदमे के दौरान, और जब धारा 164 के तहत बयान दर्ज किया जाता है तो आरोपी को बयान देने वाले व्यक्ति से जिरह करने का कोई मौका नहीं मिलता।
इसलिए कोर्ट ने कहा कि इसे मुख्य सबूत (Substantive Evidence) नहीं माना जा सकता और CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
बेंच ने 'जयेंद्र विष्णु ठाकुर बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2009' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी ज़िक्र किया। हाईकोर्ट ने दोहराया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों को बयान देते हुए देखने और उनसे क्रॉस-एग्जामिनेशन करने का अधिकार एक महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार है।
इस पृष्ठभूमि में, यह देखते हुए कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को "आरोपी की जानकारी के बिना" (Behind The Back of The Accused) इकट्ठा किए गए सबूतों के आधार पर दोषी ठहराया, हाईकोर्ट ने अपील मंज़ूर कर ली और 2011 का फैसला रद्द किया। इस तरह अपीलकर्ता को IPC की धारा 366 के तहत लगे आरोप से बरी कर दिया गया।
Case Title - Lal Babu Versus State of U.P. 2026 LiveLaw (AB) 408