संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा सकती, यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी (Co-Tenancy) की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्ष को यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है। साथ ही प्लॉट की पहचान और रिकॉर्ड में उसकी निरंतरता भी साबित करनी होगी।
जस्टिस चंद्र कुमार राय ने फैसला सुनाते हुए कहा,
“विचाराधीन प्लॉट का पैतृक होना साबित नहीं हो सका, और न ही प्लॉट की पहचान व रिकॉर्ड में उसकी निरंतरता स्थापित हो पाई। ऐसे में केवल इस आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा सकती कि पुराने समय में संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा थी।”
प्रतिवादी नंबर 1, 2 और 3 ने यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 229-B के तहत एक मुकदमा दायर किया था। इस मुकदमे में उन्होंने प्रतिवादी नंबर 3 से 29 के साथ सह-काश्तकारी घोषित किए जाने की मांग की थी। उनका तर्क था कि यह भूमि पैतृक है और इसे हिंदू संयुक्त परिवार द्वारा अर्जित किया गया। दोनों पक्षों ने भूमि पर अपने-अपने कब्ज़े का दावा किया। ट्रायल कोर्ट ने इस मुकदमे को यह कहते हुए खारिज किया कि पक्षों के बीच साझा वंश (Common Ancestry) का होना साबित नहीं हो सका।
अतिरिक्त आयुक्त (Additional Commissioner) ने वादी की अपील स्वीकार की, जबकि राजस्व बोर्ड (Board of Revenue) ने याचिकाकर्ताओं द्वारा अतिरिक्त आयुक्त के आदेश के खिलाफ दायर अपील खारिज की थी। इसके परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया।
कोर्ट ने यह पाया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों की जांच-पड़ताल करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि संबंधित संपत्ति पैतृक नहीं है और न ही प्लॉट की पहचान व उसकी निरंतरता स्थापित हो पाई है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उपरोक्त निष्कर्षों को देखते हुए अतिरिक्त आयुक्त को पुराने समय में संयुक्त हिंदू परिवार और संयुक्त हिंदू कोष (Nucleus Fund) के अस्तित्व की धारणा के आधार पर अपील स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी।
D.S. Lakshmaiah और अन्य बनाम L. Balasubramanyam और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया:
“इसलिए कानूनी सिद्धांत यह है कि सिर्फ़ संयुक्त हिंदू परिवार के अस्तित्व के आधार पर किसी संपत्ति को संयुक्त पारिवारिक संपत्ति मानने की कोई धारणा नहीं होती। जो व्यक्ति ऐसा दावा करता है, उसे ही यह साबित करना होता है कि वह संपत्ति संयुक्त पारिवारिक संपत्ति है। हालांकि, यदि दावा करने वाला व्यक्ति यह साबित कर देता है कि परिवार के पास कोई ऐसा मूल धन (Nucleus) मौजूद था, जिससे संयुक्त पारिवारिक संपत्ति खरीदी जा सकती थी तो उस संपत्ति को संयुक्त संपत्ति मानने की धारणा बन जाएगी। तब यह साबित करने का दायित्व (onus) उस व्यक्ति पर आ जाएगा, जो उस संपत्ति को अपनी निजी कमाई से खरीदी गई संपत्ति बता रहा है—उसे यह साबित करना होगा कि उसने वह संपत्ति अपने निजी पैसों से खरीदी थी, न कि परिवार के पास उपलब्ध संयुक्त मूल धन से।”
इसके अलावा, Angadi Chandranna बनाम Shankar और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने यह माना कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था। उसने अतिरिक्त आयुक्त (Additional Commissioner) तथा राजस्व बोर्ड (Board of Revenue) का आदेश रद्द कर दिया।
Case Title: Chhutta And Others v. the Board of Revenue and others 2026 LiveLaw (AB) 206