1981 हत्या मामला: 12 लोगों पर एक साथ गोली चलाने का आरोप, लेकिन शव पर मिलीं सिर्फ 3 गोली की चोटें, हाईकोर्ट ने 3 दोषियों को किया बरी

Update: 2026-07-16 08:04 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1981 के चर्चित हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन जीवित अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी किया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन का दावा था कि 12 आरोपियों ने एक साथ मृतक पर गोलियां चलाई थीं जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर केवल तीन प्रवेश घाव और एक निकास घाव मिला। कोर्ट ने इसे अभियोजन के प्रत्यक्षदर्शी बयान और चिकित्सकीय साक्ष्य के बीच गंभीर विरोधाभास मानते हुए दोषसिद्धि को टिकाऊ नहीं माना।

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने वर्ष 1984 में फतेहपुर की सत्र अदालत द्वारा सुनाए गए दोषसिद्धि के फैसले को "विकृत" करार देते हुए रद्द किया।

पूरा मामला

अभियोजन के अनुसार 19 सितंबर 1981 को सरफराज अपने ट्रैक्टर से खेत की जुताई कर रहे थे। तभी 12 आरोपी जो लाइसेंसी राइफलों और चोरी की बंदूकों से लैस थे, वहां पहुंचे। आरोप था कि कम्मू के उकसाने पर सभी 12 आरोपियों ने सरफराज की हत्या के इरादे से एक साथ गोलीबारी की।

इस मामले में अगस्त 1984 में फतेहपुर सेशन कोर्ट ने सभी 12 आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 148, 302/149, 379 और 404 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

सभी दोषियों ने इसी वर्ष हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। अपील लंबित रहने के दौरान नौ अपीलकर्ताओं की मृत्यु हो गई, जिसके कारण उनके विरुद्ध अपील समाप्त हो गई। इसके बाद केवल गुलाम, हिदायतुल्लाह और अजीजुल्लाह की अपील पर सुनवाई हुई

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अभियोजन की कहानी के अनुसार 12 लोगों ने एक साथ मृतक पर गोलियां चलाई होतीं तो उसके शरीर पर कम से कम 12 गोली लगने के निशान होने चाहिए। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल तीन प्रवेश घाव और एक निकास घाव का उल्लेख है।

कोर्ट ने कहा कि यह विरोधाभास अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। इस संबंध में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यदि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही संदेहास्पद हो और परिस्थितियों से मेल न खाती हो, तो केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।

खंडपीठ ने यह भी गौर किया कि कथित घटना स्थल से न तो गोली, न छर्रे, न कारतूस और न ही उनके खोल बरामद हुए, जबकि अभियोजन का दावा था कि 12 लोगों ने एक साथ गोलीबारी की थी।

हाईकोर्ट ने अभियोजन के गवाह शब्बीर की मौजूदगी पर भी सवाल उठाए। अभियोजन का कहना था कि घटना के दौरान एक आरोपी ने शब्बीर की लाइसेंसी दो नली बंदूक और कारतूस की पेटी छीन ली थी।

कोर्ट ने कहा कि शब्बीर का व्यवहार "बेहद अस्वाभाविक और संदेहास्पद था क्योंकि उसने न तो किसी प्रकार का विरोध किया न कोई शोर मचाया और न ही अपनी बंदूक वापस पाने के लिए अलग से FIR दर्ज कराई।

हाईकोर्ट ने कहा कि सत्र अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों का विधिसम्मत और समुचित मूल्यांकन किए बिना केवल दोनों पक्षों के बीच पुरानी दुश्मनी और रंजिश को आधार बनाकर दोषसिद्धि की।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा,

"संदेह चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।"

अदालत ने माना कि अभियोजन की कहानी बाद में गढ़ी गई और साक्ष्यों से उसका पर्याप्त समर्थन नहीं होता।

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 का दोषसिद्धि का फैसला रद्द करते हुए तीनों जीवित अपीलकर्ताओं—गुलाम, हिदायतुल्लाह और अजीजुल्लाह को सभी आरोपों से बरी किया।

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