UP Panchayat Elections: '5 साल से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता पंचायत का कार्यकाल', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा चुनाव का टाइमलाइन

Update: 2026-06-27 07:40 GMT

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टाले जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि पंचायतों का कार्यकाल संविधान के तहत निर्धारित पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि जिन प्रावधानों के आधार पर राज्य सरकार ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने और चुनाव स्थगित करने के आदेश जारी किए, उन्हें पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। इसलिए ये आदेश non est (कानून की नजर में अस्तित्वहीन) प्रतीत होते हैं।

जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ अरविंद राठौर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने 25 मई 2026 और 26 मई 2026 के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके जरिए पंचायत चुनाव टालने की प्रक्रिया अपनाई गई।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि यू.पी. पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-A), जिसके तहत ये आदेश पारित किए गए, उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने Pram Lal Patel v. State of U.P. (2000) में पहले ही संविधान के अनुच्छेद 243E और 243K का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

खंडपीठ के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 243E स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है कि प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल पहली बैठक की तारीख से पांच वर्ष होगा और "no longer" अर्थात उससे अधिक नहीं। संविधान यह भी अनिवार्य करता है कि अगली पंचायत के गठन के लिए चुनाव वर्तमान कार्यकाल समाप्त होने से पहले पूरे कर लिए जाएं।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अनुच्छेद 243K के तहत पंचायत चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण पूरी तरह राज्य निर्वाचन आयोग के पास निहित है। राज्य सरकार किसी कानून या कार्यकारी आदेश के माध्यम से इस संवैधानिक अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकती और न ही चुनाव टालने का अधिकार अपने हाथ में ले सकती।

सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया कि 10 जून 2026 को मतदाता सूची प्रकाशित की जा चुकी है और आयोग चुनाव कराने के लिए तैयार है। हालांकि, राज्य सरकार द्वारा आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने कहा कि ओबीसी आरक्षण से संबंधित आयोग की रिपोर्ट लंबित होने के कारण चुनाव नहीं कराए जा सके।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए निर्देश दिया कि वह ओबीसी आयोग की रिपोर्ट (यदि तैयार हो) और पंचायत चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा हलफनामे के माध्यम से प्रस्तुत करे। ऐसा न करने पर संबंधित अधिकारी (प्रतिवादी संख्या-2) को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।

अदालत ने संबंधित अधिकारी से व्यक्तिगत हलफनामा भी मांगा है कि जब संबंधित कानूनी प्रावधान पहले ही असंवैधानिक घोषित किए जा चुके थे, तब उन्हीं के आधार पर आदेश किस परिस्थिति में जारी किए गए। कोर्ट ने कहा कि ऐसा न होने पर इसे खंडपीठ के निर्णय की प्रथम दृष्टया अवमानना माना जा सकता है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को होगी।

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