इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समाज में बढ़ती “गन कल्चर” पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश में जारी किए गए हथियार लाइसेंसों का व्यापक डेटा मांगा है। जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने कहा कि बिना नियंत्रण के हथियारों की उपलब्धता समाज के लिए गंभीर खतरा बन रही है।
अदालत ने टिप्पणी की कि कई लोग, खासकर राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले या संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति, लाइसेंसी हथियारों का इस्तेमाल “प्रभाव और दबदबा दिखाने” के लिए कर रहे हैं, जिससे समाज में डर का माहौल बनता है।
कोर्ट ने सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम रील्स पर हथियारों के प्रदर्शन पर भी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति सामाजिक मान्यता पाने और पहचान बनाने के लिए गन कल्चर को बढ़ावा देती है, जो कानून के शासन को कमजोर करती है।
कोर्ट के अहम निर्देश:
राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से पूछा गया कि क्या उत्तर प्रदेश में आर्म्स लाइसेंस डेटाबेस तैयार किया गया है
क्या जिला मजिस्ट्रेटों के लिए कोई स्पष्ट आर्म्स पॉलिसी बनाई गई है
Arms Rules, 2016 के रूल 16 के अनुपालन की स्थिति पर जानकारी मांगी गई
सभी जिलों के डीएम को जिला और थाना स्तर पर हथियारों का पूरा विवरण देने का निर्देश
ऐसे मामलों की पहचान करने को कहा गया, जहां एक ही परिवार के कई सदस्यों के पास अलग-अलग हथियार लाइसेंस हैं
आपराधिक इतिहास वाले (2 या अधिक केस) लाइसेंस धारकों की अलग सूची बनाने का निर्देश
साथ ही, सभी एसपी, एसएसपी और पुलिस कमिश्नरों को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह जानकारी देने को कहा गया है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी:
अदालत ने कहा कि अनियंत्रित विवेकाधिकार (discretion) भ्रष्टाचार और दुरुपयोग को बढ़ावा देता है और लोकतंत्र में यह कानून के शासन के लिए खतरा है।
मामला क्या था?
यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसे जौहरी Jai Shankar Alias Bairistar ने दाखिल किया था। उनकी आर्म्स लाइसेंस की अर्जी को भदोही के जिला मजिस्ट्रेट ने करीब 4 साल की देरी के बाद खारिज कर दिया था।
हालांकि 2018 में पुलिस की रिपोर्ट उनके पक्ष में थी, फिर भी 2022 में आवेदन खारिज कर दिया गया। इसके बाद दायर अपील को भी 2025 में बिना कारण बताए खारिज कर दिया गया।
कोर्ट ने इस देरी और बिना कारण आदेश पारित करने पर सवाल उठाते हुए डीएम और अपीलीय प्राधिकारी से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है।
मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को होगी।