इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी वकील के दफ़्तर में डिजिटल काम को बेहतर बनाने के लिए टेक-सेवी युवा वकीलों को रखने का सुझाव दिया
डिजिटल काम को बेहतर बनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार को सरकारी वकील के दफ़्तर और हाईकोर्ट में जॉइंट डायरेक्टर, प्रॉसिक्यूशन के दफ़्तर में टेक-सेवी युवा वकीलों और नए लॉ ग्रेजुएट्स को मानद रिसर्च एसोसिएट के तौर पर रखना चाहिए।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने यह सुझाव दिया। बेंच ने कहा कि सरकारी वकील के दफ़्तर में डिजिटलीकरण के प्रयासों को तेज़ करना और कर्मचारियों की भारी कमी को तुरंत दूर करना समय की ज़रूरत है।
कोर्ट असल में एक ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें जांच अधिकारी लगभग एक महीने तक सरकारी वकील के दफ़्तर को ज़मानत से जुड़े ज़रूरी निर्देश देने में नाकाम रहा। इस देरी की वजह से कोर्ट ने पहले आगरा के पुलिस कमिश्नर और प्रॉसिक्यूशन डायरेक्टर को तलब किया।
आखिरकार, 19 मार्च को आगरा के एडिशनल पुलिस कमिश्नर हाईकोर्ट के सामने वर्चुअली पेश हुए और कंप्लायंस एफिडेविट (हलफ़नामा) दाख़िल किया। इसमें बताया गया कि लापरवाही बरतने वाले जांच अधिकारी को सस्पेंड किया गया और उसके ख़िलाफ़ विभागीय जांच के आदेश दिए गए।
हाईकोर्ट को यह भरोसा भी दिलाया गया कि भविष्य में ऐसी कोई लापरवाही नहीं होगी और पुलिस कमिश्नर यह सुनिश्चित करेंगे कि सरकारी वकील के दफ़्तर को निर्देश जल्द-से-जल्द भेजे जाएं।
दूसरी ओर, एडिशनल एडवोकेट जनरल अनूप त्रिवेदी ने भी बताया कि उन्होंने सरकारी वकील के दफ़्तर को ज़मानत से जुड़े मामलों में निर्देशों को लेकर सतर्क रहने का निर्देश दिया। साथ ही इस संबंध में ज़िला पुलिस प्रमुख को भी पत्र भेजे जाने चाहिए।
उन्होंने आगे बताया कि फ़िलहाल, सरकारी वकील के दफ़्तर में क्रिमिनल रिट और हेबियस कॉर्पस की कॉपियां स्कैन की जा रही हैं, लेकिन कर्मचारियों की कमी के कारण ज़मानत अर्जियां अभी स्कैन नहीं की जा रही हैं।
उन्होंने आगे कहा कि जब भी पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध होंगे तो ज़मानत अर्जियां भी स्कैन और डिजिटाइज़ की जाएंगी।
बेंच को यह भी बताया गया कि सभी संबंधित पक्षों को अलर्ट भेजने और डिजिटाइज़्ड डेटा तक पहुंच देने के लिए एक 'ई-मनु ऐप' तैयार किया गया।
इन बातों पर गौर करते हुए बेंच ने कहा कि यूपी सरकार को सरकारी वकील के दफ़्तर में कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी चाहिए। बेंच ने कहा कि इससे यह सुनिश्चित होगा कि रियल-टाइम डेटा फीड किया जाए। साथ ही ज़मानत याचिकाओं सहित अन्य आपराधिक फ़ाइलों को स्कैन किया जाए ताकि पुलिस और अन्य एजेंसियों से ज़रूरी निर्देश तेज़ी से हासिल किए जा सकें।
बेंच ने यूपी के प्रधान सचिव (कानून), साथ ही यूपी सरकार के मुख्य सचिव से इस मामले को देखने और सरकारी वकील के दफ़्तर के लिए कुशल स्टाफ़ मुहैया कराने, साथ ही E-Manu App पर समय पर डेटा फीड करने को कहा।
बेंच ने सुझाव दिया,
"...सरकारी वकील के दफ़्तर के साथ-साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अभियोजन के संयुक्त निदेशक के दफ़्तर में कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए युवा वकीलों या नए लॉ ग्रेजुएट्स को, जो कंप्यूटर और डिजिटल टेक्नोलॉजी में माहिर हों, (BAIL No. 6405 of 2026 2) ओडिशा राज्य (एडवोकेट जनरल का दफ़्तर) की तरह ही रिसर्च एसोसिएट के तौर पर मानद आधार पर नियुक्त किया जाना चाहिए।"
मामले के गुण-दोषों पर विचार करते हुए कोर्ट ने लूट के आरोपी बबलू यादव उर्फ़ बिल्ला द्वारा दायर ज़मानत याचिका मंज़ूर की। उसके वकील ने दलील दी कि शुरुआती FIR में उसका नाम नहीं था और उसे पांच सौ रुपये, एक देसी पिस्तौल और एक कबाड़ के थैले की कथित बरामदगी के आधार पर झूठा फंसाया गया।
तथ्यों, आरोपी की संलिप्तता और सबूतों की प्रकृति का मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट ने उसे ज़मानत दी।
Case title - Babloo Yadav @ Billa vs. State of U.P 2026 LiveLaw (AB) 119