बिना कारण बताए दिए गए आदेश के खिलाफ विशेष अपील सुनवाई योग्य, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर Rule 5 की रोक भारी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि किसी एकल न्यायाधीश (Single Judge) का आदेश बिना कारण बताए (Non-Speaking Order) पारित किया गया है, तो उसके खिलाफ विशेष अपील (Special Appeal) सुनवाई योग्य होगी, भले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली, 1952 के Rule 5 में ऐसी अपील पर रोक का प्रावधान हो।
चीफ़ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने कहा कि आदेश में कारण दर्ज करना प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का अभिन्न हिस्सा है।
इसलिए, यदि कोई आदेश कारणों से रहित है, तो Rule 5 के तहत लगाया गया प्रतिबंध प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों के आगे टिक नहीं सकता।
मामला एक सोसायटी की प्रबंधन समिति द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें उप-पंजीयक (Deputy Registrar), आगरा द्वारा सोसायटी का पंजीकरण रद्द करने तथा आयुक्त, आगरा मंडल द्वारा अपील और पुनर्विचार याचिका खारिज किए जाने के आदेशों को चुनौती दी गई थी।
एकल न्यायाधीश ने यह कहते हुए आयुक्त के आदेश रद्द कर दिए थे कि अपीलीय प्राधिकारी ने पूर्व के एक निर्णय में निर्धारित कानून का सही पालन नहीं किया।
हालांकि, आदेश में न तो मामले के तथ्यों पर चर्चा की गई, न चुनौती दिए गए आदेशों का विश्लेषण किया गया और न ही यह स्पष्ट किया गया कि याचिका स्वीकार की गई या केवल निस्तारित की गई।
इस आदेश के खिलाफ दायर विशेष अपील पर प्रतिवादी ने Rule 5 का हवाला देते हुए कहा कि अपील सुनवाई योग्य नहीं है।
वहीं, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि जब आदेश पूरी तरह Non-Speaking हो, तब विशेष अपील का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के Abhishek Gupta v. Dinesh Kumar फैसले का हवाला देते हुए कहा कि Rule 5 को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि वह न्याय तक पहुंच के अधिकार को बाधित करे।
अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांत—विशेषकर कारणयुक्त आदेश देने का दायित्व—Rule 5 पर प्राथमिकता रखते हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के Kranti Associates निर्णय में स्पष्ट किया गया है कि न्यायिक आदेशों में कारण दर्ज करना न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।
कारणों के बिना पारित आदेश को कानून की कसौटी पर टिकाऊ नहीं माना जा सकता।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने विशेष अपील स्वीकार करते हुए 24 फरवरी 2026 के एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द कर दिया और रिट याचिका को पुनः मूल संख्या पर बहाल करते हुए कानून के अनुसार नए सिरे से सुनवाई के लिए एकल पीठ के समक्ष भेज दिया।