इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ एक्ट, 2016' की धारा 57 के तहत पहले से सर्टिफ़ाइड विकलांगता के प्रतिशत को, MBBS कोर्स में बेंचमार्क विकलांगता वाले लोगों के एडमिशन के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन की गाइडलाइंस के तहत बने मेडिकल असेसमेंट बोर्ड द्वारा दोबारा तय नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि बोर्ड का काम सिर्फ़ कैंडिडेट की कोर्स करने की क्षमता (फ़ंक्शनल कॉम्पिटेंसी) का आकलन करना है, और विकलांगता को दोबारा मापना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

इस एक्ट की धारा 56 उचित सरकार को विकलांगता के स्तर का आकलन करने के लिए गाइडलाइंस जारी करने और सर्टिफ़ाइंग अथॉरिटी तय करने का अधिकार देती है। साथ ही धारा 57 उस अथॉरिटी को तय करती है - जो इस मामले में ज़िले के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर हैं।

जस्टिस शेखर बी. सराफ़ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने कहा,

“यह बेहद अफ़सोसनाक स्थिति है कि 'राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ (RPwD) एक्ट, 2016' की धारा 57 के तहत सक्षम अथॉरिटी द्वारा जारी विकलांगता सर्टिफ़िकेट को कानूनी रूप से सबसे ज़्यादा अहमियत और बाध्यकारी होने के बावजूद, यह कोर्ट हर एकेडमिक सेशन में बार-बार दायर होने वाली रिट याचिकाओं से भरा रहता है।”

शुभम मिश्रा के पास सुल्तानपुर के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर का सर्टिफ़िकेट है, जिसमें क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल कंडीशन (बेल्स पाल्सी) के तहत 45% स्थायी विकलांगता दर्ज है और 02.12.2023 को जारी एक यूनिक डिसेबिलिटी ID कार्ड भी है। उन्होंने NEET (UG) 2026 में PwBD कैटेगरी में ऑल-इंडिया रैंक 948 हासिल की। उनके साथ याचिका दायर करने वालों में से एक को गंभीर रूप से सुनने में अक्षमता (प्रोफ़ाउंड हियरिंग लॉस) के लिए 50% और अंधेपन के लिए 40% विकलांगता सर्टिफ़िकेट मिला।

काउंसलिंग से पहले, विकलांगता वाले हर कैंडिडेट को फ़ंक्शनल कॉम्पिटेंसी पर योग्यता सर्टिफ़िकेट लेना ज़रूरी है। 11.08.2026 के सर्टिफिकेट के ज़रिए, मेडिकल असेसमेंट बोर्ड ने पाया कि मिश्रा MBBS कोर्स पूरा करने में सक्षम हैं, लेकिन उनकी बेंचमार्क विकलांगता को 45% से घटाकर 20% कर दिया और उन्हें PwD रिज़र्वेशन के लिए अयोग्य माना। अपीलेट मेडिकल PwD असेसमेंट बोर्ड ने 21.08.2026 को इस निष्कर्ष को सही ठहराया।

इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 27.07.2026 को कमीशन द्वारा जारी गाइडलाइंस का मकसद सिर्फ़ यह जांचना था कि क्या कोई उम्मीदवार उचित सुविधा और सहायक तकनीक के साथ मेडिकल की पढ़ाई कर सकता है या नहीं; विकलांगता की मात्रा तय करना पूरी तरह से सर्टिफाइंग अथॉरिटी का काम है।

प्रतिवादियों ने कहा कि तय फ़ॉर्मेट में ही बेंचमार्क विकलांगता के प्रतिशत के लिए एक कॉलम होता है। साथ ही पात्रता की जांच गाइडलाइंस के क्लॉज़ 12.4 के तहत की जानी है।

कोर्ट ने माना कि जब धारा 57 के तहत जारी कोई सर्टिफिकेट रद्द नहीं किया गया हो, उसे चुनौती न दी गई हो और वह लागू हो, तो उसमें दर्ज प्रतिशत उस तथ्य का कानूनी तौर पर तय किया गया आंकड़ा होता है और यह सभी अथॉरिटीज़ पर बाध्यकारी होता है, जब तक कि किसी सक्षम फ़ोरम द्वारा इसे रद्द न कर दिया जाए। कोर्ट ने देखा कि गाइडलाइंस का क्लॉज़ 3.17 एक्ट के सेक्शन 2(r) के तहत PwBD की परिभाषा को अपनाता है और क्लॉज़ 9.1 40% की सीमा को एक्ट में ही तय करता है।

आगे कहा गया,

“बोर्ड का काम बस यह देखना है कि क्या 2016 के एक्ट के तहत पहले से सर्टिफ़ाइड और तय की गई विकलांगता के बावजूद, उम्मीदवार में MBBS कोर्स करने और उसे पूरा करने की क्षमता है या नहीं—चाहे इसके लिए उचित सुविधा और सहायक टेक्नोलॉजी की ज़रूरत हो या न हो। यह मेडिकल की पढ़ाई करने की क्षमता का आकलन है, न कि विकलांगता के तथ्य या उसके स्तर का दोबारा आकलन।”

यह देखते हुए कि सुप्रीम कोर्ट ने ओंकार रामचंद्र गोंड बनाम भारत संघ, ओम राठौड़ बनाम स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक और अनमोल बनाम भारत संघ के मामलों में कहा कि केवल विकलांगता का स्तर तय होने से कोई उम्मीदवार अयोग्य नहीं हो जाता, कोर्ट ने सौम्या पाल बनाम भारत संघ मामले में समान विचार रखने वाली डिवीज़न बेंच के फ़ैसले को ही माना।

कोर्ट ने कहा कि फ़ॉर्म का कोई कॉलम मूल कानून द्वारा नहीं दिए गए अधिकार को नहीं दे सकता। साथ ही गाइडलाइंस की कोई भी ऐसी शर्त जो बोर्ड को बेंचमार्क विकलांगता के स्तर को दोबारा तय करने का अधिकार देती हो, वह एक्ट के ख़िलाफ़ और आर्टिकल 14 का उल्लंघन करने वाली होगी। क्लॉज़ 12.4 की जांच करने पर, कोर्ट ने पाया कि यह क्लॉज़ बोर्ड को विकलांगता का स्तर तय करने का कोई अधिकार नहीं देता है।

कोर्ट ने कहा,

“इसके अलावा, हमें हैरानी है कि जब गाइडलाइंस का क्लॉज़ 12.3(b) साफ़ तौर पर कहता है कि 'किसी भी उम्मीदवार को केवल UDID कार्ड या विकलांगता सर्टिफ़िकेट में दर्ज बेंचमार्क विकलांगता के प्रतिशत के आधार पर अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा' तो असेसमेंट बोर्ड अपने एलिजिबिलिटी सर्टिफ़िकेट में विकलांगता का प्रतिशत कम करके उम्मीदवार को अयोग्य घोषित करने के लिए कुछ नुकसानदेह तरीके कैसे अपना सकता है।”

यह मानते हुए कि दोनों बोर्ड ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया और सर्टिफ़ाइंग अथॉरिटी के विशेष कानूनी अधिकार क्षेत्र में दखल दिया, कोर्ट ने एलिजिबिलिटी सर्टिफ़िकेट और अपीलेट री-असेसमेंट पर मेडिकल राय में दर्ज अयोग्यता के निष्कर्षों को रद्द कर दिया, लेकिन काम करने की क्षमता (फ़ंक्शनल कॉम्पिटेंसी) का निष्कर्ष बरकरार रखा।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को NEET (UG) 2026 काउंसलिंग के लिए PwBD आरक्षित श्रेणी के तहत योग्य उम्मीदवार माना जाए, अंतरिम आदेशों को पक्का किया। साथ ही निर्देश दिया कि उन आदेशों के तहत अस्थायी रूप से आवंटित सीटों में कोई बदलाव न किया जाए। यह स्पष्ट किया गया कि कार्यात्मक क्षमता मूल्यांकन की आवश्यकता में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा, और आयोग को सभी मूल्यांकन बोर्डों को स्पष्टीकरण संबंधी निर्देश जारी करने की छूट दी गई।

Case Title: Shubham Mishra v. Union of India, Thru. Secy. Ministry Of Health And Family Welfare, New Delhi And 10 Others

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