इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टाटा प्रोजेक्ट्स का ₹940 करोड़ का हाईवे कॉन्ट्रैक्ट बहाल किया, कहा- NHAI का कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने का फैसला 'पहले से तय'

Update: 2026-07-11 13:42 GMT

टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (NHAI), जो संविधान के आर्टिकल 12 के तहत "राज्य" (State) है, मनमाने ढंग से हाईवे बनाने का कॉन्ट्रैक्ट बीच में ही खत्म नहीं कर सकती और न ही देरी के लिए कॉन्ट्रैक्टर को जिम्मेदार ठहरा सकती है, जब देरी खुद अथॉरिटी की गलती से हुई हो—जैसे कि कॉन्ट्रैक्ट के तहत बिना किसी रुकावट वाली ज़मीन और साफ़ रास्ता (clear right of way) न सौंप पाना।

जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी ने कहा,

"इस मामले में आर्टिकल 12 के तहत 'राज्य' मानी जाने वाली पार्टी का काम जनहित के काम को प्रभावित करने वाला और मनमाना पाया गया। इसलिए यह कोर्ट व्यापक जनहित में न्याय के साथ किसी भी तरह के खिलवाड़ को रोकने की अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हटेगी। अगर नेशनल हाईवे बनाने के प्रोजेक्ट में देरी 'राज्य' (जो कॉन्ट्रैक्ट की एक पार्टी है) की लापरवाही, असावधानी और मनमानी के कारण होती है तो कोर्ट के लिए इस याचिका में उठाए गए ऐसे कदमों के असली कारणों को समझने के लिए 'कॉर्पोरेट आवरण' (corporate veil) को हटाकर देखना पूरी तरह सही है।"

कोर्ट ने आगे कहा कि 'राज्य' की एजेंसी के ऐसे मनमाने कदम को आर्टिकल 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र (writ jurisdiction) में चुनौती दी जा सकती है, भले ही समझौते में आर्बिट्रेशन क्लॉज़ (मध्यस्थता की शर्त) हो। ऐसा तब किया जा सकता है, जब विवाद दस्तावेजों की व्याख्या पर आधारित हो और अथॉरिटी का अपना रिकॉर्ड ही एक तरह से सही बात को स्वीकार करता हो, न कि किसी असल विवादित तथ्य पर।

NHAI ने दिसंबर 2018 में गढ़मुक्तेश्वर और मेरठ के बीच NH-709A के 50.254 km हिस्से को चौड़ा और अपग्रेड करने के लिए प्रस्ताव मंगाए, जिसकी लागत ₹940.68 करोड़ थी। टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को चुना गया और मार्च 2021 में एक्सेप्टेंस लेटर (स्वीकृति पत्र) जारी किया गया। काम शुरू करने की तारीख 10 अक्टूबर 2021 तय की गई थी और काम पूरा करने की समय-सीमा 10 अक्टूबर 2023 थी।

21 सितंबर 2021 के हैंडओवर मेमोरेंडम में कुल लंबाई के 47.620 km, यानी 94.76% हिस्से के सौंपे जाने की बात दर्ज थी। हालांकि, याचिकाकर्ता ने बार-बार शिकायत की कि बिना रुकावट वाले हिस्से उपलब्ध नहीं कराए जा रहे थे। इसके बाद प्रोजेक्ट को समय पर पूरा न करने जैसे कारणों से अन्य बातों के साथ-साथ बीच में ही कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया।

इस कॉन्ट्रैक्ट को खत्म करने और उसके बाद की कार्रवाई को हाईकोर्ट में रिट अधिकार क्षेत्र के तहत चुनौती दी गई।

कोर्ट ने पाया कि इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) एग्रीमेंट के तहत अथॉरिटी की यह ज़िम्मेदारी थी कि वह एग्रीमेंट के 30 दिनों के भीतर ज़रूरी 'राइट ऑफ़ वे' (काम करने का रास्ता) का कम से कम 90% हिस्सा उपलब्ध कराए। यह हिस्सा रुकावट-मुक्त होना चाहिए था और कम-से-कम 5 किमी के लगातार हिस्सों में होना चाहिए। आर्टिकल 8.2 के तहत पार्टियों और अथॉरिटी के इंजीनियर को एक "हैंडओवर मेमोरेंडम" तैयार करना था। इसमें साइट की इन्वेंट्री (विवरण) दर्ज की जानी थी, जिसमें खाली और बिना रुकावट वाली ज़मीन और उस पर मौजूद कोई भी इमारत, ढांचा, पेड़ या अन्य अचल संपत्ति शामिल हो। इस पर हस्ताक्षर को इस बात का वैध सबूत माना जाना था कि कॉन्ट्रैक्टर को 'राइट ऑफ़ वे' दे दिया गया।

कोर्ट ने पाया कि अथॉरिटी का अपना रिकॉर्ड ही हैंडओवर मेमोरेंडम के विपरीत है। अथॉरिटी के 8 अगस्त 2022 के एक पत्र में माना गया कि असल में 50.254 किमी में से केवल 29.914 किमी हिस्सा ही सौंपा गया। कोर्ट ने देखा कि अथॉरिटी के इंजीनियर की 10 जुलाई, 2024 की रिपोर्ट को काउंटर एफिडेविट में नकारा नहीं गया। रिपोर्ट में बताया गया कि रुकावटें और ज़मीन से जुड़े मुद्दे अभी भी बने हुए। इसमें 247 दिनों की और मोहलत देने की सिफारिश की गई।

यह देखते हुए कि हैंडओवर मेमोरेंडम के अपेंडिक्स में केवल छोटी-मोटी यूटिलिटीज़ जैसे बिजली के खंभे, एक पाइपलाइन और कुछ हैंड पंपों का ज़िक्र था, लेकिन इमारतों, मंदिर और ज़मीन से जुड़े मुद्दों को छोड़ दिया गया, कोर्ट ने माना कि इसमें दर्ज कब्ज़ा "सिर्फ़ कागज़ी कार्रवाई" थी और अपेंडिक्स खुद "धोखा देने वाला और गुमराह करने वाला" था।

कोर्ट ने माना कि कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने का फ़ैसला बिना सोचे-समझे लिया गया, क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने के आदेश की भाषा वैसी ही थी जैसी 'शो कॉज़ नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) की, और कॉन्ट्रैक्टर के दस्तावेज़ों के साथ दिए गए विस्तृत जवाब पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया। कोर्ट ने अथॉरिटी के व्यवहार को "राज्य की ओर से अनुचित व्यवहार" और कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने के फ़ैसले को "पूरी तरह मनमाना और रिकॉर्ड से साफ तौर पर ज़ाहिर" बताया।

अथॉरिटी की इस दलील पर कि कॉन्ट्रैक्टर को एग्रीमेंट के आर्टिकल 26 के तहत आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) के लिए भेजा जाना चाहिए, कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ आर्बिट्रेशन क्लॉज़ होने या तथ्य से जुड़े किसी कथित विवादित सवाल के होने से रिट अधिकार क्षेत्र (writ jurisdiction) खत्म नहीं हो जाता, खासकर तब जब राज्य के अपने दस्तावेज़ों से स्पष्ट रूप से बात स्वीकार की गई हो और विवाद कानून से जुड़ा हो जो उन दस्तावेज़ों की व्याख्या पर निर्भर करता हो।

सुप्रीम कोर्ट के ABL इंटरनेशनल लिमिटेड बनाम एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, MP पावर मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड बनाम स्काई पावर साउथईस्ट सोलर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और ए.पी. इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट कॉरपोरेशन बनाम तहसीलदार जैसे मामलों में दिए गए फ़ैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि तथ्य से जुड़े विवादित सवाल का इस्तेमाल किसी जायज़ दावे को खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता, और रुके हुए नेशनल हाईवे को पूरा करने में जनहित को देखते हुए याचिका पर मेरिट के आधार पर फ़ैसला करना सही था।

आगे कहा गया,

"जब कॉन्ट्रैक्ट की पहली पार्टी खुद ही अपनी ड्यूटी और ज़िम्मेदारियाँ निभाने में नाकाम रही, तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह एग्रीमेंट के तहत उन प्रावधानों का इस्तेमाल करने की स्थिति में है जो उसे एकतरफ़ा तौर पर कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने का अधिकार देते हैं... सबसे हैरानी की बात यह है कि याचिकाकर्ता ने प्रोग्रेस से जुड़ी अलग-अलग रिपोर्ट, फ़ोटो, रुकावटों और ज़मीन से जुड़े मुद्दों आदि का ज़िक्र करते हुए जो विस्तृत जवाब दिया था, उस पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया गया; ऐसा लगा मानो अथॉरिटी ने पहले से ही यह तय कर लिया था कि याचिकाकर्ता का जवाब चाहे जो भी हो, उसका कॉन्ट्रैक्ट बीच में ही खत्म कर देना है।"

याचिका को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने 14 जनवरी 2025 के कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने के आदेश उसके बाद बैंक गारंटी ज़ब्त करने की कार्रवाई और 3 फरवरी 2025 को जारी नए टेंडर रद्द किया। कॉन्ट्रैक्टर के 14 महीनों में काम पूरा करने के वादे को रिकॉर्ड करते हुए और यह देखते हुए कि किसी तीसरे पक्ष के अधिकार नहीं बने थे और कब्ज़ा कॉन्ट्रैक्टर के पास ही था, कोर्ट ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे एक महीने के भीतर साइट का नया संयुक्त निरीक्षण करें और EPC एग्रीमेंट के तहत बड़े जनहित में प्रोजेक्ट का नया शेड्यूल बनाकर उसे पूरा करें।

Case Title: Tata Projects Limited v. Union of India and 2 others

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