इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को वकील की याचिका खारिज की। इस याचिका में जगद्गुरु रामभद्राचार्य के ख़िलाफ़ FIR दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई। यह मांग 'उपाध्याय' समुदाय और शंकराचार्य समेत सम्मानित धार्मिक हस्तियों के बारे में उनकी कथित टिप्पणियों को लेकर की गई।

जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने कहा कि FIR दर्ज न होने से परेशान व्यक्ति को आमतौर पर हाईकोर्ट के आर्टिकल 226 के तहत विशेष अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से पहले 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए।

इस तरह कोर्ट ने वकील रमेश उपाध्याय की रिट याचिका खारिज की। हालांकि, उन्हें कानून के तहत उचित उपाय अपनाने की छूट दी गई।

मामले का संक्षिप्त विवरण

अपनी क्रिमिनल रिट याचिका में याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह 'उपाध्याय' समुदाय से है। उसने आरोप लगाया कि जगद्गुरु रामभद्राचार्य के कुछ बयानों से उसे और समुदाय के अन्य सदस्यों को "गहरी मानसिक पीड़ा, अपमान और बेइज्जती" का सामना करना पड़ा।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने उपाध्यायों को "नीच/अधम" (low/inferior) कहा और चार शंकराचार्यों को 'फर्जी' (Fake) बताया, जिससे कई अनुयायियों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि इन बयानों और उनसे जुड़े वीडियो को YouTube समेत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से फैलाया गया।

याचिकाकर्ता ने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उसने आरोप लगाया कि रामभद्राचार्य अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके उसे या संभावित गवाहों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उसने 8 अक्टूबर, 2025 को वाराणसी के पुलिस कमिश्नर के ज़रिए शिकायत दर्ज कराई और उचित दंडात्मक प्रावधानों के तहत रामभद्राचार्य के ख़िलाफ़ FIR दर्ज करने की मांग की थी; हालांकि, कोई FIR दर्ज नहीं की गई।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया। सरकार का तर्क था कि याचिकाकर्ता संबंधित पुलिस स्टेशन नहीं गया और मजिस्ट्रेट के सामने BNSS की धारा 175(3) के तहत उपाय का इस्तेमाल किए बिना सीधे हाई कोर्ट आ गया। राज्य ने 8 अक्टूबर के पत्र के मिलने पर भी सवाल उठाया और कहा कि इसके मिलने का कोई सबूत या पोस्टल ट्रैकिंग रिकॉर्ड में नहीं है।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

शुरुआत में, बेंच ने कहा कि भले ही हाईकोर्ट के पास आर्टिकल 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति है, लेकिन यह अधिकार क्षेत्र विवेकाधीन है। आम तौर पर इसका इस्तेमाल तब नहीं किया जाना चाहिए, जब कोई असरदार वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो।

कोर्ट ने कहा:

"इस कोर्ट की सोच यह है कि अगर किसी व्यक्ति को शिकायत है कि पुलिस ने उसकी FIR दर्ज नहीं की है, या FIR दर्ज होने के बाद भी ठीक से जांच नहीं हो रही है तो पीड़ित व्यक्ति के लिए उपाय यह नहीं है कि वह संविधान के आर्टिकल 226 के तहत हाईकोर्ट जाए, बल्कि उसे CrPC की धारा 156(3) [BNSS की धारा 175(3)] के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट के पास जाना चाहिए।"

बेंच ने आगे कहा कि मजिस्ट्रेट के पास उपलब्ध उपाय "सिर्फ एक विकल्प" नहीं है, बल्कि "मुख्य और प्राथमिकता वाला उपाय है, जिसे आर्टिकल 226 के तहत हाईकोर्ट जाने से पहले आज़माया जाना चाहिए"।

कोर्ट ने ज़ोर दिया कि BNSS की धारा 173(4) और 175(3) FIR दर्ज करने और जांच से जुड़ी शिकायतों के लिए एक असरदार कानूनी तरीका प्रदान करती हैं।

आगे कहा गया,

"याचिकाकर्ता के मजिस्ट्रेट के पास जाए बिना ही रिट याचिका पर सुनवाई करने का मतलब असल में यह होगा कि यह कोर्ट पहली सुनवाई का मंच बन जाए, जिससे तय कानूनी प्रक्रिया को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया जाएगा, जो कि मंज़ूर नहीं है।"

कोर्ट ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया सिर्फ़ एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक सोच-समझकर बनाया गया कानूनी ढांचा है ताकि यह पक्का किया जा सके कि संवैधानिक उपायों का इस्तेमाल करने से पहले शिकायतों का समाधान सही स्तर पर हो।

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस बात पर भी विवाद था कि क्या याचिकाकर्ता ने रिट याचिका दायर करने से पहले FIR दर्ज कराने के लिए किसी पुलिस अधिकारी से संपर्क किया।

इस संदर्भ में, कोर्ट ने मुक़दमा करने वालों के बीच आर्टिकल 226 के तहत हाईकोर्ट आने के "बढ़ते चलन" पर चिंता जताई, जिसमें वह BNSS के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों को आज़माए बिना ही FIR दर्ज करने के लिए पुलिस को निर्देश देने की मांग करते हैं।

इसके अलावा, अपने आदेश में ललिता कुमारी फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) सामने आता है तो पुलिस अपराध दर्ज करने की अपनी कानूनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि 'ललिता कुमारी' मामले का फ़ैसला किसी पीड़ित व्यक्ति को कानूनी उपायों को नज़रअंदाज़ करने की इजाज़त नहीं देता, भले ही पुलिस अपनी ड्यूटी निभाने में नाकाम रही हो।

इसलिए इस रिट याचिका को बिना किसी ठोस आधार के खारिज कर दिया गया। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह मिलने पर कानून के तहत उचित उपाय अपनाने की छूट दी।

Case title - Ramesh Upadhyay vs. State Of U.P. And 4 Others 2026 LiveLaw AB) 653

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