'चिंताजनक स्थिति': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सज़ा पाए दोषी को 6 साल से कम सज़ा काटने के बाद सज़ा में छूट देने पर सवाल उठाए

Update: 2026-07-09 04:37 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के लिए उम्रकैद की सज़ा पाए एक दोषी को सज़ा में छूट देने पर गंभीर चिंता जताई, जिसे अपनी सज़ा के केवल 5 साल, 10 महीने और 18 दिन काटने के बाद रिहा कर दिया गया।

जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की बेंच ने इसे "चिंताजनक स्थिति" करार दिया।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (गृह) से एक व्यक्तिगत हलफनामा भी मांगा, जिसमें उन मानदंडों और आधारों का खुलासा किया जाए जिनके आधार पर ऐसी छूट दी गई।

यह बेंच मुख्य रूप से शैलेंद्र सिंह द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी ने कहा कि मुख्य अपराधी (जय देव सिंह) को IPC की धारा 302 के साथ धारा 148 के तहत दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि अपराध की गंभीरता के बावजूद, उसे सज़ा के केवल 5 साल, 10 महीने और 18 दिन काटने के बाद छूट दे दी गई।

इस दलील पर गौर करते हुए बेंच ने कहा:

"प्रथम दृष्टया, यह एक काफी चिंताजनक स्थिति लगती है कि किस तरह एक गंभीर अपराध के लिए दोषी ठहराए गए और उम्रकैद की सज़ा पाए व्यक्ति को केवल साढ़े पांच साल सज़ा काटने के बाद छूट दे दी गई"।

गृह विभाग के शीर्ष अधिकारी से जवाब मांगते हुए, बेंच ने याचिकाकर्ता को दोषी (जय देव सिंह) को सह-प्रतिवादी (co-respondent) बनाने का भी निर्देश दिया। साथ ही यह भी आदेश दिया कि उसे नोटिस जारी किया जाए।

मामले को चार सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।

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