इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि बिल्डिंग मैप की मंजूरी देने वाली अथॉरिटी निजी भूमि के मालिकाना हक के विवाद का फैसला नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में अथॉरिटी को केवल यह देखना है कि संबंधित जमीन पर कोई प्रभावी इंजंक्शन ऑर्डर लागू है या नहीं।

जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि अथॉरिटी के पास जमीन के मालिकाना हक को विवादित घोषित करने का अधिकार नहीं है, सिवाय उन मामलों के जहां जमीन सरकार या ग्राम सभा की हो अथवा किसी न्यायिक कार्यवाही का विषय हो।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता ने अपनी जमीन पर निर्माण के लिए बिल्डिंग मैप की मंजूरी के लिए आवेदन किया था। इस पर मुजफ्फरनगर विकास प्राधिकरण ने संबंधित उप-जिलाधिकारी (SDM) से रिपोर्ट मांगी।

SDM की रिपोर्ट में कहा गया कि जमीन कई लोगों के हाथों से होते हुए याचिकाकर्ता तक पहुंची थी और उसकी पूरी स्वामित्व श्रृंखला मौजूद थी। बिक्री विलेख भी कायम था और उसे किसी अदालत ने निरस्त नहीं किया था।

इसके बावजूद SDM ने याचिकाकर्ता के मालिकाना हक को संदेह के घेरे में माना।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने कहा कि विकास प्राधिकरण का काम भवन निर्माण नियमों को लागू करना और आवेदक के प्रथम दृष्टया अधिकार को देखना है। निजी स्वामित्व या टाइटल का विवाद तय करना सिविल कोर्ट का क्षेत्र है।

प्राधिकरण की ओर से बताया गया कि बिक्री विलेख को चुनौती देते हुए पांच मुकदमे दायर किए गए हैं। इनमें से एक मामले में 9 जुलाई 2024 को इंजंक्शन दिया गया था, लेकिन बाद में वह प्रभावी नहीं रहा। हालांकि, 10 फरवरी 2026 को एकपक्षीय आदेश के जरिए इसे फिर बढ़ाया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि जिस समय विवादित आदेश पारित हुआ था, उस समय जमीन पर कोई प्रभावी इंजंक्शन नहीं था। इसलिए मैप मंजूरी का आवेदन खारिज करने का कोई आधार नहीं था।

कोर्ट ने संबंधित दोनों आदेशों को रद्द कर दिया और मामले को मुजफ्फरनगर विकास प्राधिकरण के पास वापस भेजते हुए नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।

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