“भागो, पुलिस आ गई; हाय, गोली लग गई” — 'फिल्मी स्क्रिप्ट' जैसी FIR पर हाईकोर्ट ने UP Police को फिर फटकारा

Update: 2026-02-24 10:51 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर पर गंभीर असंतोष जताया है, जिसे अदालत ने “फिल्मी पटकथा से प्रेरित” बताया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस आपराधिक मामलों में एक मानक, अतिरंजित स्क्रिप्ट का इस्तेमाल कर रही है और ऐसे मामले “बाएं-दाएं” दर्ज किए जा रहे हैं।

जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ यूपी गो-वध निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामला हरदोई जिले का है।

FIR में फिल्मी अंदाज़

FIR के अनुसार, पुलिस को एक अधूरे मकान में गो-वध की सूचना मिली। मौके पर पहुंचने पर कथित रूप से आरोपियों ने फिल्मी अंदाज़ में संवाद बोले:

“पुलिस आ गई है, भागो”

“पुलिस वाले बिना मारे पीछा नहीं छोड़ेंगे”

FIR में यह भी दर्ज था कि एक सब-इंस्पेक्टर पर गोली चलाई गई जो “कान के पास से सनसनाती हुई निकल गई।” जवाबी फायरिंग में एक आरोपी ने कथित रूप से चिल्लाया — “हाय, गोली लग गई।”

घायल आरोपी ने कथित रूप से गो-वंश लाने की बात कबूल की और याचिकाकर्ता को साथी बताया, जो मौके से फरार हो गया।

गो-वंश निजी व्यक्ति को सौंपने पर सवाल

अदालत ने पुलिस द्वारा बरामद गो-वंश को घटनास्थल से दूर रहने वाले एक निजी व्यक्ति को सौंपे जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने पूछा कि ऐसा किस कानूनी प्रावधान के तहत किया गया।

राज्य की ओर से यह भी स्वीकार किया गया कि बरामदगी का कोई अलग मेमो तैयार नहीं किया गया था।

अपराध prima facie नहीं बनता

अदालत ने कहा कि चूंकि गो-वध अभी हुआ ही नहीं था, इसलिए प्रथम दृष्टया गो-वध अधिनियम की धाराएं 3/5/8, बीएनएस या आर्म्स एक्ट के तहत अपराध बनता नहीं दिखता।

पुलिस स्क्रिप्ट से एफआईआर लिख रही है”

हाईकोर्ट ने कहा कि यह अकेला मामला नहीं है। हाल ही में भी ऐसी एफआईआर पर टिप्पणी की गई थी जिसमें पुलिस द्वारा फिल्मी संवादों का इस्तेमाल पाया गया था।

कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस के पास कोई तैयार स्क्रिप्ट है जिसे मामूली बदलाव के साथ बार-बार इस्तेमाल किया जा रहा है।

एसएसपी से व्यक्तिगत हलफनामा तलब

अदालत ने हरदोई के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें इन कमियों और विसंगतियों पर स्पष्टीकरण देना होगा।

यदि हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो संबंधित एसपी को रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा।

 याचिकाकर्ता को राहत

कोर्ट ने अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न करने का भी आदेश दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का दुरुपयोग और अतिरंजित एफआईआर न्याय व्यवस्था को प्रभावित करते हैं और ऐसे मामलों की गंभीरता से जांच आवश्यक है।

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