दूसरी जगह की जमीन पर पुराने फैसले भी मुआवजा तय करने में प्रासंगिक हो सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में भले ही 'एक ही गांव और एक ही नोटिफिकेशन' का सिद्धांत सीधे लागू न हो, लेकिन पहले के मामलों में अधिग्रहित जमीन की लोकेशन और परिस्थितियां बाजार मूल्य तय करने में प्रासंगिक हो सकती हैं।
जस्टिस संदीप जैन ने यह टिप्पणी करते हुए मुआवजा ₹1.30 से बढ़ाकर ₹20 प्रति वर्ग गज कर दिया। मामला गाजियाबाद तहसील के महाराजपुर गांव की जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा था, जिसे औद्योगिक विकास के लिए अधिग्रहित किया गया था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Ghaziabad Development Authority v. Anoop Singh और Ghaziabad Development Authority v. Ram Krishana मामलों का हवाला दिया।
इन मामलों में दूसरे गांव की जमीन के लिए अधिक मुआवजा तय किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही वहां की जमीन अलग गांव और अलग नोटिफिकेशन के तहत अधिग्रहित हुई थी, लेकिन उसकी लोकेशन को मौजूदा मामले में ध्यान में रखा जा सकता है।
कोर्ट ने पाया कि अधिग्रहित जमीन मोहन नगर-नई दिल्ली लिंक रोड पर थी और कनॉट प्लेस से करीब 8 किलोमीटर दूर थी। आसपास कई उद्योग भी चल रहे थे और जमीन को कॉलोनी विकसित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने की पर्याप्त संभावनाएं थीं।
कोर्ट ने कहा कि जमीन भले ही उस समय विकसित नहीं थी, लेकिन उसकी potentiality काफी अधिक थी, जिसे बाजार मूल्य तय करते समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि, पुराने कानून की धारा 25 लागू होने के कारण कोर्ट मुआवजा उतना ही बढ़ा सकता था जितना भूमि मालिक ने पहले दावा किया था। इसलिए मुआवजा ₹20 प्रति वर्ग गज तय किया गया, साथ में 15% सोलैटियम और 6% ब्याज देने का निर्देश दिया गया।