मुआवजा याचिका पूरी सुनवाई के बाद सिर्फ क्षेत्राधिकार के आधार पर खारिज नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण पूरी सुनवाई कराने के बाद केवल क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र न होने के आधार पर मुआवजा याचिका खारिज नहीं कर सकता, खासकर तब जब किसी भी प्रतिवादी ने यह साबित न किया हो कि मामले की सुनवाई उस स्थान पर होने से उसे कोई नुकसान या पूर्वाग्रह हुआ।
जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166(2) दुर्घटना पीड़ित को दावा दायर करने के लिए मंच चुनने का अधिकार देती है। याचिका उस क्षेत्र के अधिकरण में दायर की जा सकती है जहां दुर्घटना हुई, जहां दावेदार रहता या कारोबार करता है अथवा जहां प्रतिवादी रहता है।
अदालत ने कहा कि लंबा समय बीत जाने और गवाहों के बयान दर्ज हो जाने के बाद केवल क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के आधार पर दावा खारिज करना मोटर वाहन अधिनियम के उस लाभकारी उद्देश्य को विफल करेगा, जिसका मकसद दुर्घटना पीड़ितों को उचित और पर्याप्त मुआवजा उपलब्ध कराना है। ऐसा करना दावेदार के वास्तविक अधिकारों पर महज तकनीकी आपत्ति को हावी होने देना होगा।
मामला राजेंद्र सिंह की सड़क दुर्घटना से जुड़ा था। 7 सितंबर 2012 को वह कानपुर नगर के सरसौल स्थित अपने घर लौट रहे थे, तभी एक कार ने उनकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी, दो बच्चों और मां ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत सीतापुर स्थित मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में 30,41,000 रुपये मुआवजे और 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की मांग करते हुए याचिका दायर की।
अधिकरण ने आठ मुद्दे तय किए और सबसे पहले अपने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का सवाल उठाया। अधिकरण ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं था जिससे पता चले कि दावेदारों ने कानपुर से सीतापुर अपना स्थायी निवास स्थान बदल लिया। साथ ही कार का मालिक या चालक भी सीतापुर में नहीं रहता या काम करता था। इसके आधार पर अधिकरण ने 2 जुलाई 2014 को बाकी मुद्दों पर विचार किए बिना क्षेत्राधिकार के अभाव में दावा खारिज किया और दावेदारों को सक्षम अधिकरण के समक्ष जाने की छूट दी।
दावेदारों ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि किसी भी प्रतिवादी ने यह दावा नहीं किया कि सीतापुर में मुकदमा चलने से उसे कोई नुकसान हुआ और न ही ऐसा कोई नुकसान साबित किया गया। उन्होंने कहा कि अधिकरण ने क्षेत्राधिकार का मुद्दा तय किया जरूर था, लेकिन उसे प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करने के बजाय पूरी सुनवाई कराई और सभी साक्ष्य लेने के बाद अंत में केवल तकनीकी आधार पर दावा खारिज कर दिया।
दावेदारों ने यह भी बताया कि नेशनल इंश्योरेंस कंपनी ने सीतापुर में अपना लिखित बयान शपथपूर्वक दाखिल किया, जिससे यह भी साबित होता है कि वह सीतापुर में कारोबार कर रही थी।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मंटू सरकार बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, मालती सरदार बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और बलवीर बत्रा बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का अभाव किसी आदेश या अवॉर्ड को स्वत: शून्य नहीं बना देता। कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जिससे दुर्घटना पीड़ितों के लिए न्याय पाने का रास्ता आसान हो।
अदालत ने विशेष रूप से पाया कि बीमा कंपनी ने सीतापुर में शपथपूर्वक अपना लिखित बयान दाखिल किया। हाईकोर्ट ने कहा कि यह तथ्य अपने आप में सीतापुर के अधिकरण को धारा 166(2) के तहत क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र देने के लिए पर्याप्त था, क्योंकि दावा उस अधिकरण में भी दायर किया जा सकता है जिसके स्थानीय क्षेत्र में प्रतिवादी रहता है। अधिकरण ने इस महत्वपूर्ण तथ्य पर विचार नहीं किया और गंभीर त्रुटि की।
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकरण ने क्षेत्राधिकार से जुड़े मुद्दे को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय नहीं किया। इसके बजाय उसने सभी पक्षों को मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश करने का पूरा अवसर दिया और मुकदमे की पूरी सुनवाई की। ऐसे में पूरी कार्यवाही के दौरान किसी भी चरण पर 'पूर्वाग्रह' या नुकसान के सवाल पर विचार किए बिना अंत में पूरी कार्यवाही को क्षेत्राधिकार के तकनीकी आधार पर खत्म करना उचित नहीं था।
अदालत ने पाया कि किसी भी प्रतिवादी ने किसी चरण पर यह नहीं कहा कि सीतापुर में सुनवाई से उसे कोई नुकसान हुआ है और रिकॉर्ड में भी ऐसा कोई तथ्य नहीं था। इसलिए न्याय में कोई विफलता नहीं हुई, जबकि मृतक के आश्रितों को पूरी सुनवाई के बाद महज तकनीकी आधार पर उनके दावे से वंचित कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में एक स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति भी दी। यह प्रमाणपत्र 31 जुलाई 2014 का था और उसमें तीसरे अपीलकर्ता का पता सीतापुर जिले के गांव हेमपुर का दर्ज था। विधवा ने बताया कि वह कम पढ़ी-लिखी गृहिणी है और उसके तत्कालीन वकील ने उसे यह दस्तावेज दाखिल करने की सलाह नहीं दी थी।
अदालत ने इस स्पष्टीकरण को विश्वसनीय माना और रफीक बनाम मुंशीलाल के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब पक्षकार ने मुकदमे की जिम्मेदारी वकील को सौंपकर अपनी ओर से उचित कदम उठाए थे, तो वकील की ओर से दस्तावेज पेश न किए जाने की चूक के लिए पक्षकार को नुकसान नहीं भुगतना चाहिए।
हाईकोर्ट ने 2 जुलाई 2014 का अधिकरण का आदेश रद्द किया और मामला सीतापुर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण को वापस भेज दिया। अधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह दावा याचिका स्वीकार कर मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला करे।