भरण-पोषण बकाया में एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारंट जारी करना अवैध: इलाहाबाद हाइकोर्ट
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट में प्रचलित उस प्रक्रिया पर सख्त आपत्ति जताई, जिसके तहत भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिए एक ही समय पर वसूली वारंट और गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए जाते हैं।
हाइकोर्ट ने इस प्रथा को अवैध और अमानवीय बताते हुए कहा है कि इसे तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए।
जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भरण-पोषण देने के दायित्व में चूक करने वाले व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले के अभियुक्त की तरह नहीं माना जा सकता। अदालतों को यह ध्यान रखना होगा कि भरण-पोषण आदेश के प्रवर्तन के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि अदालत यह भी मान ले कि भरण-पोषण की बकाया राशि जानबूझकर अदा नहीं की गई, तब भी कानून अदालतों को यह अधिकार नहीं देता कि वे अत्यधिक उत्साह में व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दें।
इस मामले में हाइकोर्ट ने अलीगढ़ की एडिशनल प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता मोहम्मद शहज़ाद के खिलाफ भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिए एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए थे। याचिका BNSS की धारा 528 के तहत दाखिल की गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा (2021) के फैसले में भरण-पोषण आदेशों के सख्ती से पालन पर जोर दिया गया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि प्रवर्तन की प्रक्रिया कानून के प्रावधानों के विपरीत नहीं हो सकती।
राज्य की ओर से पेश अपर सरकारी वकील ने भी यह स्वीकार किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(3) और 128 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना भरण-पोषण की बकाया राशि के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी नहीं किया जा सकता। हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता पूर्व में भुगतान की शर्तों का उल्लंघन कर चुका है।
हाइकोर्ट ने CrPC की धारा 125(3) और धारा 421 का उल्लेख करते हुए कहा कि भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली उसी प्रक्रिया से की जानी चाहिए, जो जुर्माने की वसूली के लिए निर्धारित है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 421 के तहत वसूली का तरीका संपत्ति की कुर्की और बिक्री या फिर कलेक्टर के माध्यम से भूमि राजस्व की तरह राशि की वसूली है। इस प्रावधान में साफ तौर पर गिरफ्तारी या जेल में निरुद्ध करने के माध्यम से वसूली की मनाही की गई।
जस्टिस शुक्ला ने कहा कि कानून यह व्यवस्था करता है कि जब वसूली की प्रक्रिया अपनाने के बाद भी राशि प्राप्त न हो, तभी कारावास पर विचार किया जा सकता है। ऐसे में वसूली वारंट और गिरफ्तारी वारंट का एक साथ जारी किया जाना न तो CrPC में कल्पित है और न ही सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में इसका कोई आधार है।
कोर्ट ने फैमिली कोर्टों द्वारा इस तरह की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर चिंता जताई और कहा कि कई मामलों में भरण-पोषण न देने वाले व्यक्ति के खिलाफ गिरफ्तारी या गैर-जमानती वारंट जारी किए गए, मानो वह किसी आपराधिक मामले का आरोपी हो। हाइकोर्ट ने इसे स्पष्ट रूप से वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की गई कार्रवाई बताया।
भरण-पोषण आदेशों को सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत धनादेश की तरह लागू किए जाने की दलील को भी हाइकोर्ट ने खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 18(2) यह स्पष्ट करती है कि CrPC के अध्याय 9 के अंतर्गत पारित आदेशों का निष्पादन उसी प्रक्रिया से होगा, जो दंड प्रक्रिया संहिता में निर्धारित है। उत्तर प्रदेश फैमिली कोर्ट नियम, 2006 के तहत वेतन की कुर्की की व्यवस्था को कोर्ट ने एक अतिरिक्त उपाय बताया, न कि दंड प्रक्रिया संहिता की प्रक्रिया का विकल्प।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया और मामला पुनः अलीगढ़ की फैमिली कोर्ट को भेज दिया, ताकि कानून के अनुरूप नए सिरे से निर्णय लिया जा सके। साथ ही हाइकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि भरण-पोषण के मामलों में एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारंट जारी करने की प्रथा पर अब विराम लगना चाहिए।