इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नियुक्ति प्राधिकारी केवल राज्य सरकार के निर्देश के आधार पर किसी कर्मचारी की नियुक्ति रद्द नहीं कर सकता। नियुक्ति रद्द करने से पहले संबंधित प्राधिकारी को मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा और अपने विवेक का इस्तेमाल करना होगा।

जस्टिस राजीव सिंह ने उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव बैंक के सहायक प्रबंधकों की वर्ष 2019 में की गई सेवा समाप्ति रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इन कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द करने के आदेश मुख्य सचिव, सहकारिता के निर्देश पर जारी किए गए और नियुक्ति प्राधिकारी ने अपने स्तर पर मामले पर विचार नहीं किया।

पीठ ने कहा,

“नियुक्ति प्राधिकारी ने केवल संबंधित विभाग के प्रधान सचिव के निर्देश पर सेवा समाप्ति के आदेश पारित किए। प्रबंध समिति ने प्रस्ताव पारित किया और उसके बाद प्रबंध निदेशक ने औपचारिक आदेश जारी किया, लेकिन दोनों स्तरों पर आदेश पारित करते समय स्वतंत्र रूप से विचार करने का कोई प्रमाण नहीं है।”

मामला उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक में सहायक प्रबंधकों की भर्ती से जुड़ा था। 26 जून 2015 को भर्ती का विज्ञापन जारी हुआ। उस समय निर्धारित योग्यता के अनुसार वाणिज्य, अर्थशास्त्र, गणित या सांख्यिकी में 50 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातक अथवा बैंकिंग और वित्त में प्रबंध अध्ययन या स्नातकोत्तर डिप्लोमा मांगा गया।

आवेदन की अंतिम तारीख से पहले ही योग्यता में बदलाव कर किसी भी विषय में 50 प्रतिशत अंकों के साथ ग्रेजुएशन की डिग्री को भी पात्रता में शामिल कर लिया गया। इस बदलाव को 16 जुलाई 2015 को सहकारी समितियों के निबंधक-सह-आयुक्त ने मंजूरी दी थी।

याचिकाकर्ताओं को 15 अक्टूबर 2015 को चयनित घोषित किया गया और फरवरी 2016 में उन्होंने कार्यभार ग्रहण कर लिया। उनके नियुक्ति पत्र उन याचिकाओं के परिणाम के अधीन थे, जो असफल अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में दाखिल की थीं।

बाद में गैर-सरकारी संगठन की शिकायत पर अक्टूबर 2018 में जांच के आदेश दिए गए। जांच रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि बैंक के अधिकारियों की मिलीभगत से शैक्षणिक योग्यता में बदलाव किया गया और नियुक्ति पत्र जल्दबाजी में जारी किए गए।

इसके बाद सहकारिता विभाग के प्रधान सचिव ने 27 अप्रैल 2019 और 24 मई 2019 को पत्र भेजकर 50 सहायक प्रबंधकों की नियुक्तियां रद्द करने का निर्देश दिया। प्रबंध समिति ने 30 मई 2019 को उसी के अनुरूप प्रस्ताव पारित किया और 7 जून 2019 को कर्मचारियों की सेवा समाप्त कर दी गई। उन्हें एक महीने के वेतन के बराबर रकम भी दी गई।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में दलील दी कि योग्यता में बदलाव तत्कालीन निबंधक-सह-आयुक्त ने किया, जिन्हें कानून के तहत ऐसा करने का अधिकार था। इसके बावजूद उनके खिलाफ न तो कोई विभागीय कार्रवाई शुरू की गई और न ही कोई आरोप पत्र दाखिल किया गया। आपराधिक मामले में भी आरोप पत्र दाखिल नहीं हुआ और आवश्यक स्वीकृति भी नहीं ली गई।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के मध्य प्रदेश राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड, भोपाल बनाम नानूराम यादव के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी कर्मचारी को किसी उच्च अधिकारी की सिफारिश या निर्देश के आधार पर, बिना स्वतंत्र विचार किए, सेवा से नहीं हटाया जा सकता।

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि भर्ती की योग्यता तत्कालीन प्रबंध निदेशकों के कहने पर इस तरह बदली गई, जिससे उनके परिचितों को नियुक्ति में लाभ मिल सके। यह भी बताया गया कि परीक्षा समिति और साक्षात्कार बोर्ड के दो सदस्यों के रिश्तेदार भी चयनित अभ्यर्थियों में शामिल थे। जांच में उत्तर पुस्तिकाओं में कथित हेरफेर भी सामने आने की बात कही गई।

हालांकि, राज्य की ओर से यह विवादित नहीं किया गया कि याचिकाकर्ताओं में से किसी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि योग्यता में बदलाव निबंधक-सह-आयुक्त ने किया था और कानून के तहत वह इसके लिए सक्षम थे। इसके बाद चयन प्रक्रिया पूरी हुई। अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ व्यक्तिगत तौर पर किसी अवैध कृत्य का आरोप नहीं लगाया गया।

पीठ ने कहा,

“सहकारिता विभाग के प्रधान सचिव के आदेश में याचिकाकर्ताओं के किसी अवैध कृत्य का कोई उल्लेख तक नहीं है।”

अदालत ने राज्य सरकार और नियुक्ति प्राधिकारी के बीच हुए पत्राचार की जांच के बाद पाया कि सेवा समाप्ति का पूरा आधार प्रधान सचिव के 27 अप्रैल और 24 मई 2019 के पत्र थे। प्रबंध समिति और प्रबंध निदेशक ने केवल उन निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई की।

हाईकोर्ट ने नानूराम यादव मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत पर भरोसा किया, जिसके अनुसार किसी कर्मचारी की सेवा केवल किसी उच्च अधिकारी की सिफारिश या निर्देश पर समाप्त नहीं की जा सकती। नियुक्ति प्राधिकारी को मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करना आवश्यक है।

इन आधारों पर हाईकोर्ट ने सभी रिट याचिकाएं मंजूर कर लीं और सहायक प्रबंधकों की सेवा समाप्ति के आदेश रद्द कर दिए। याचिकाकर्ताओं को दोबारा सेवा में शामिल होने की अनुमति दी गई।

हालांकि, सेवा समाप्ति की तारीख से हाईकोर्ट के फैसले की तारीख तक की अवधि को 'काम नहीं तो वेतन नहीं' के आधार पर माना जाएगा।

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