इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई महिला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करती है तो वह केवल लिव-इन संबंधों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण का लाभ नहीं ले सकती, जब तक कि उसने ऐसे संबंध का स्पष्ट दावा न किया हो और उसे साबित भी न किया हो।
अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत विशेष रूप से तब लागू होगा जब संबंधित पुरुष ने किसी भी प्रकार के संबंध से साफ इनकार किया हो।
जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला ने कहा,
"जब न तो लिव-इन संबंध का कोई स्पष्ट दावा किया गया हो और न ही दोनों पक्षों के बीच विवाह संपन्न होने का कोई साक्ष्य हो, तब धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने वाली महिला लिव-इन संबंध में रहने वाले व्यक्तियों को मिलने वाले लाभ का दावा नहीं कर सकती, खासकर तब, जब दूसरा पक्ष ऐसे किसी संबंध के अस्तित्व से स्पष्ट रूप से इनकार कर रहा हो।"
मामला मंजू सोनकर की ओर से दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका से जुड़ा था। उन्होंने कौशांबी के फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उनके नाबालिग बेटे को भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया लेकिन उनके स्वयं के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि वह दूसरे पक्ष की विधिक रूप से पत्नी नहीं हैं।
फैमिली कोर्ट ने यह भी पाया कि संबंधित पुरुष का पहले से एक वैध विवाह था और हिंदू कानून के तहत पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह मान्य नहीं है।
हाईकोर्ट में मंजू सोनकर की ओर से दलील दी गई कि वह विधिक रूप से पत्नी हैं और उन्हें पहले से हुए विवाह की जानकारी नहीं थी। इसलिए केवल इस आधार पर उन्हें भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा मामले के फैसले का हवाला भी दिया।
हाईकोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस फैसले में कहा कि यदि कोई महिला लंबे समय तक किसी पुरुष के साथ पत्नी की तरह रह रही हो, तो कुछ परिस्थितियों में उसे धारा 125 के तहत भरण-पोषण का अधिकार मिल सकता है। हालांकि अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले के तथ्य अलग हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि चनमुनिया मामले में विवाह या संबंध का अस्तित्व विवादित नहीं था जबकि इस मामले में संबंधित पुरुष ने किसी भी वैवाहिक या अन्य संबंध से साफ इनकार किया। साथ ही महिला यह भी साबित नहीं कर सकीं कि दोनों के बीच विवाह हुआ था।
अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दावा या साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि दोनों लिव-इन संबंध में साथ रह रहे थे। इसलिए इस मामले में चनमुनिया फैसले का लाभ नहीं दिया जा सकता।
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का आदेश तर्कसंगत और विधिसम्मत है। इसी आधार पर अदालत ने मंजू सोनकर की आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज की।