सिर्फ संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा करने से तीसरा पक्ष लघु वाद अदालत में जरूरी पक्षकार नहीं बन जाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति पर स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा कर देने मात्र से कोई तीसरा व्यक्ति लघु वाद अदालत में जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बन जाता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे व्यक्ति को तभी पक्षकार बनाया जा सकता है, जब उसके मालिकाना हक का फैसला किए बिना वादी को मांगी गई राहत देने का निर्णय संभव न हो।
जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि पक्षकार जोड़ने की शक्ति का उद्देश्य सामने आए विवाद का प्रभावी और पूर्ण निपटारा करना है न कि किसी ऐसे स्वतंत्र विवाद को मुकदमे में शामिल करना जिसका वादी की मांगी गई राहत से सीधा संबंध न हो।
अदालत ने कहा,
“संपत्ति में हित का केवल दावा कर देना किसी व्यक्ति को जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बनाता। महत्वपूर्ण यह है कि उसके बिना अदालत के सामने मौजूद विवाद का प्रभावी और पूर्ण निपटारा किया जा सकता है या नहीं।”
मामला दो मंजिला इमारत के भूतल पर स्थित एक दुकान से जुड़ा था। पक्षकारों के अनुसार यह संपत्ति स्वर्गीय जगदीश प्रसाद मित्तल की थी। बुलंदशहर के अपर जिला जज, न्यायालय संख्या एक के समक्ष लघु वाद लंबित था। इसी दौरान याचिकाकर्ता ने खुद को मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की मांग की।
याचिकाकर्ता का दावा था कि जगदीश प्रसाद मित्तल ने 22 नवंबर 2019 को दो गवाहों की मौजूदगी में उसके पक्ष में एक अपंजीकृत वसीयत की थी। उसका कहना था कि वादी किसी दूसरी वसीयत के आधार पर संपत्ति पर अपना एकमात्र अधिकार जता रहा है जबकि वास्तविक अधिकार उसके पास है।
वादी ने इसका विरोध करते हुए याचिकाकर्ता को परिवार से असंबंधित व्यक्ति बताया और उसकी वसीयत को मुकदमे में देरी कराने के लिए तैयार किया गया कथित दस्तावेज बताया। वादी ने 23 सितंबर 2019 की पंजीकृत वसीयत पर भरोसा किया।
निचली अदालत ने याचिकाकर्ता को पक्षकार बनाने की अर्जी खारिज कर दी थी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता के पास किसी सक्षम अदालत का ऐसा कोई आदेश नहीं था जिसमें उसके द्वारा दावा की गई वसीयत के आधार पर उसके अधिकारों को मान्यता दी गई हो।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने दलील दी कि निचली अदालत बिना उसे साक्ष्य पेश करने का अवसर दिए उसकी वसीयत को जाली नहीं मान सकती थी।
उसने कहा कि केवल अपंजीकृत होने के कारण वसीयत अवैध नहीं हो जाती और वसीयतकर्ता अपने स्वाभाविक उत्तराधिकारियों को संपत्ति से वंचित कर सकता है। इसलिए उसे दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश एक नियम 10 के तहत पक्षकार बनाया जाना चाहिए था।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि संपत्ति के मालिकाना हक का सवाल मौजूद है, इसलिए लघु वाद अदालत को प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 23 के तहत वादपत्र वापस कर देना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि यह तय करने के लिए कि कोई व्यक्ति जरूरी या उचित पक्षकार है या नहीं, सबसे पहले यह देखना होगा कि वादी ने क्या राहत मांगी और उस राहत को देने के लिए अदालत को किन सवालों का जवाब देना आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का दावा मकान मालिक और किरायेदार के उस संबंध से जुड़ा नहीं था, जिसके आधार पर मूल मुकदमा चल रहा था। उसका पूरा दावा 22 नवंबर 2019 की वसीयत पर आधारित था। उस वसीयत की वास्तविकता, उसके निष्पादन और उसके प्रभाव का फैसला करना अलग विवाद था।
अदालत ने कहा कि मूल मुकदमे में वादी की राहत पर फैसला करने के लिए इस विवाद का निपटारा जरूरी नहीं था।
पीठ ने अपने पूर्व के फैसले मूर्ति मार्कंडेश्वर जी महाराज गोपाल की बगिया सिटी झांसी बनाम ज्योति गंगवानी मामले का भी उल्लेख किया। उस मामले में भी संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार का दावा करने वाले तीसरे व्यक्ति को पक्षकार बनाने से इनकार किया गया था।
अदालत ने माना था कि मकान मालिक-किरायेदार संबंध से जुड़े मुकदमे को स्वतंत्र मालिकाना हक के विवाद तक नहीं बढ़ाया जा सकता और ऐसे दावे का फैसला सक्षम अदालत के समक्ष होना चाहिए।
धारा 23 के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि लघु वाद अदालत के समक्ष किसी मामले में मालिकाना हक का सवाल सामने आ जाने मात्र से वाद सुनवाई योग्य नहीं हो जाता। महत्वपूर्ण यह है कि क्या वादी के अधिकार और मांगी गई राहत का आधार ऐसे मालिकाना हक के निर्धारण पर निर्भर करता है जिसका अंतिम फैसला लघु वाद अदालत नहीं कर सकती।
अदालत ने कहा,
“तीसरे व्यक्ति की ओर से स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा अपने आप धारा 23 को लागू नहीं करता। यह प्रावधान तब लागू होता है जब वादी का अधिकार और उसके द्वारा मांगी गई राहत ऐसे मालिकाना हक के साबित या असिद्ध होने पर निर्भर करती हो, जिसका लघु वाद अदालत अंतिम रूप से निर्धारण नहीं कर सकती।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने 22 नवंबर 2019 की वसीयत की वास्तविकता, उसके निष्पादन या उसके कानूनी प्रभाव पर कोई अंतिम राय नहीं दी। निचली अदालत की ओर से वसीयत की प्रकृति के संबंध में की गई टिप्पणियों को भी वसीयत की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता ने पहले ही एक अलग मूल वाद दाखिल कर अपनी वसीयत के आधार पर अधिकार घोषित करने की मांग की है। उस मुकदमे में उसे कोई अंतरिम रोक नहीं मिली थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि वह मुकदमा याचिकाकर्ता को अपने दावे के लिए उचित मंच उपलब्ध कराता है, लेकिन इससे उसे मौजूदा लघु वाद में पक्षकार बनने का अधिकार नहीं मिल जाता।
पीठ ने कहा,
“संपत्ति पर स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा करने वाला तीसरा व्यक्ति केवल इसलिए लघु वाद का जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बन जाता कि उसका दावा वादी के दावे से अलग या विरोधाभासी है। जब तक उसके दावे का फैसला वादी की मांगी गई राहत निर्धारित करने के लिए आवश्यक न हो स्वतंत्र मालिकाना हक के विवाद को आदेश एक नियम 10 के तहत मुकदमे में शामिल नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत के आदेश में ऐसा कोई अधिकार क्षेत्र संबंधी दोष, गंभीर अनियमितता या विकृति नहीं थी, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने पुनर्विचार याचिका खारिज की।