प्राचार्य की जारी सूची वरिष्ठता सूची नहीं मानी जा सकती, आपत्ति न करने से अधिकार खत्म नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी शिक्षण संस्थान के प्राचार्य या प्रबंधन समिति के अलावा किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा जारी शिक्षकों की सूची को वरिष्ठता सूची नहीं माना जा सकता। यदि नियमानुसार वरिष्ठता सूची प्रकाशित ही नहीं की गई है तो किसी शिक्षक द्वारा उस पर आपत्ति न करने का अर्थ यह नहीं होगा कि उसने अपनी वरिष्ठता पर दावा करने का अधिकार छोड़ दिया है।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 के तहत बनाए गए विनियमों की व्याख्या करते हुए यह फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि विनियम 3 के अनुसार वरिष्ठता सूची केवल प्रबंधन समिति द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए तैयार की जा सकती है। किसी संस्थान में कार्यरत शिक्षकों का केवल विवरण देने वाली सूची, जिसे प्राचार्य या अन्य कोई अधिकारी जारी करे, उसे वरिष्ठता सूची नहीं माना जा सकता।
मामला सीतापुर के कृषक इंटर कॉलेज के दो प्रवक्ताओं के बीच वरिष्ठता विवाद से जुड़ा था। अपीलकर्ता जय राम की नियुक्ति अंग्रेजी लेक्चरर के रूप में वर्ष 1996 में हुई थी, जबकि प्रतिवादी प्रफुल्ल कुमार मिश्रा की जीवविज्ञान लेक्चरर के रूप में पहले तदर्थ नियुक्ति हुई और बाद में वर्ष 2000 से नियमितीकरण किया गया।
वर्ष 2017 में संयुक्त शिक्षा निदेशक ने दोनों की नियमित नियुक्ति की तिथि के आधार पर जय राम को वरिष्ठ माना था। हालांकि, सिंगल बेंच ने यह आदेश रद्द कर दिया था। सिंगल बेंच का मानना था कि वर्ष 1997, 2005, 2006 और 2012 की वरिष्ठता सूचियों में प्रफुल्ल कुमार मिश्रा का नाम ऊपर था और जय राम ने कभी उन पर आपत्ति नहीं की।
इस आदेश को चुनौती देते हुए दायर विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने कहा कि जिन दस्तावेजों को वरिष्ठता सूची माना गया, वे वास्तव में वरिष्ठता सूची थे ही नहीं।
अदालत ने पाया कि वर्ष 2005 और 2016-17 की सूचियां प्राचार्य द्वारा जारी की गईं, जबकि वर्ष 2006 का दस्तावेज केवल शिक्षकों के प्रारंभिक नियुक्ति क्रम का विवरण था, जिसे जिला विद्यालय निरीक्षक को भेजा गया। इन्हें वैधानिक वरिष्ठता सूची नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सेवा संबंधी लाभ, जैसे पदोन्नति आदि के लिए तैयार होने वाली वरिष्ठता सूची और प्रबंधन समिति के गठन से संबंधित वरिष्ठता सूची, दोनों अलग-अलग हैं और दोनों का उद्देश्य भी अलग है।
अदालत ने यह भी कहा कि संस्थान की वार्षिक पत्रिका में शिक्षकों का विवरण प्रकाशित होने मात्र से उसे वरिष्ठता सूची नहीं माना जा सकता। यह केवल सूचनात्मक दस्तावेज होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अंतिम वरिष्ठता सूची का संबंधित शिक्षकों के बीच प्रसारित किया जाना भी आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं होगा तो कोई भी शिक्षक न तो उस पर आपत्ति दर्ज करा सकेगा और न ही वैधानिक अपील का अधिकार प्रयोग कर पाएगा।
अदालत ने कहा,
"आपत्ति केवल उसी वरिष्ठता सूची पर की जा सकती है, जो वैधानिक प्रावधानों के अनुसार सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिवत प्रकाशित की गई हो। किसी अक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी सूची को वरिष्ठता सूची नहीं माना जा सकता, इसलिए उस पर आपत्ति न करने से किसी शिक्षक का अधिकार समाप्त नहीं होता।"
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि प्रतिवादी के पक्ष में कोई ऐसा अर्जित अधिकार पैदा नहीं हुआ, क्योंकि अपीलकर्ता की आपत्ति उठाने से पहले न तो उसे उच्च पद पर पदोन्नति मिली थी और न ही उससे वरिष्ठ मानकर कोई अतिरिक्त लाभ दिया गया।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने विशेष अपील स्वीकार करते हुए एकल पीठ का आदेश रद्द किया और अपीलकर्ता जय राम को प्रतिवादी से वरिष्ठ मानते हुए सभी परिणामी सेवा लाभ देने का निर्देश दिया।