सहकर्मी की आलोचना या भर्ती प्रक्रिया पर चर्चा करना अपने आप में कदाचार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी सेवा नियम में कर्मचारियों को सहकर्मियों के प्रति शिष्टाचार बनाए रखने की अपेक्षा का यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि हर असहमति, निष्पक्ष आलोचना या संस्थान के मामलों पर चर्चा को कदाचार (Misconduct) मान लिया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई फैकल्टी सदस्य भर्ती प्रक्रिया को लेकर चिंता व्यक्त करने के लिए बैठक बुलाता है, तो केवल इसी आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि उसका उद्देश्य किसी सहकर्मी को अपमानित, प्रताड़ित या उसकी छवि खराब करना था।
जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने IIT कानपुर के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संजय मित्तल के खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
मामला वर्ष 2018 का है, जब प्रोफेसर मित्तल ने विभाग में हुई हालिया नियुक्तियों में कथित प्रक्रियागत खामियों पर चर्चा के लिए फैकल्टी बैठक बुलाई थी। इस बैठक में नए नियुक्त एक प्रोफेसर को आमंत्रित नहीं किया गया, जिसके बाद उनके खिलाफ उत्पीड़न और गैर-पेशेवर व्यवहार की शिकायत हुई। जांच के बाद IIT प्रशासन ने उनके दो वार्षिक वेतनवृद्धि (Annual Increments) रोक दीं और तीन साल तक प्रशासनिक जिम्मेदारियों से वंचित कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में भर्ती प्रक्रिया और विभागीय कार्यप्रणाली पर फैकल्टी के बीच चर्चा होना स्वाभाविक है और इसे अपने आप में कदाचार नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी और बोर्ड के निष्कर्ष ठोस साक्ष्यों के बजाय केवल अनुमान और संभावित प्रभाव (Imaginary Inference) पर आधारित थे।
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यदि जांच अधिकारी सेवानिवृत्त न्यायाधीश हों, तो आरोपित कर्मचारी को कानूनी सहायता से वंचित करना प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice) के विपरीत हो सकता है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई के निष्कर्ष, IIT बोर्ड के प्रस्ताव और संबंधित कार्यालय आदेश को रद्द कर दिया तथा प्रोफेसर मित्तल को कानून के अनुसार सभी सेवा संबंधी लाभ (Consequential Service Benefits) देने का निर्देश दिया।