इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि संविदा कर्मचारी समान काम के लिए समान वेतन का दावा कर सकते हैं, बशर्ते वे यह साबित करें कि वे नियमित रूप से नियुक्त कर्मचारियों के समान काम कर रहे थे। हालांकि, काम की प्रकृति, गुणवत्ता, जिम्मेदारियों और संवेदनशीलता में समानता साबित करने का दायित्व कर्मचारियों पर ही होगा।

जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL), झांसी के संविदा कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन और भत्ते देने के श्रम आयुक्त के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल पद का नाम समान होना समान वेतन का अधिकार देने के लिए पर्याप्त नहीं है।

क्या था मामला?

BHEL कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन ने उत्तर प्रदेश के श्रम आयुक्त के समक्ष दावा किया था कि विभिन्न ठेकेदारों के माध्यम से नियुक्त कर्मचारी कई वर्षों से स्थायी प्रकृति का काम कर रहे हैं और उनका काम BHEL के नियमित कर्मचारियों के समान है।

5 जनवरी, 2005 को श्रम आयुक्त ने ड्यूटी रोस्टर, लॉगबुक, गेट पास, वेतन पर्ची और अनुभव प्रमाणपत्र सहित विभिन्न दस्तावेजों के आधार पर 265 संविदा कर्मचारियों को BHEL के नियमित अकुशल कर्मचारियों के बराबर वेतन और भत्ते देने का निर्देश दिया था।

BHEL ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि श्रम आयुक्त ने काम की वास्तविक समानता, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, प्रशिक्षण और जिम्मेदारियों का उचित मूल्यांकन नहीं किया।

काम की समानता साबित करने का दायित्व कर्मचारियों पर

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम जगजीत सिंह मामले में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि समान वेतन का दावा करने वाले कर्मचारियों को नियमित पद के साथ अपनी समानता साबित करनी होगी।

कोर्ट ने पाया कि कथित तुलनात्मक चार्ट में कर्मचारियों के नाम, पदनाम, विभाग, नियुक्ति की तारीख, काम की प्रकृति और ठेकेदारों का विवरण तो था, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता था कि संविदा और नियमित कर्मचारी वास्तव में समान काम कर रहे थे।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा पर्याप्त विवरण नहीं था जिससे संविदा कर्मचारियों और नियमित कर्मचारियों द्वारा किए गए वास्तविक काम की तुलना की जा सके।

श्रम आयुक्त का आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह लिख देना कि दस्तावेजों का अवलोकन किया गया है, पर्याप्त नहीं है। आदेश में स्पष्ट कारण और इस बात का विश्लेषण होना चाहिए कि समान वेतन के कानूनी मानदंड पूरे होते हैं या नहीं।

कोर्ट ने माना कि पर्याप्त साक्ष्य और कारणों के बिना पारित आदेश को रिट अधिकारिता के तहत रद्द किया जा सकता है।

इसलिए हाईकोर्ट ने श्रम आयुक्त का आदेश रद्द करते हुए मामला नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया। श्रम आयुक्त को निर्देश दिया गया कि फैसले की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से छह महीने के भीतर नया आदेश पारित किया जाए।

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