इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि District Rural Development Agency (DRDA) में कार्यरत कर्मचारियों को उत्तर प्रदेश के 2016 के नियमितीकरण नियमों का लाभ नहीं दिया जा सकता, क्योंकि DRDA सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत एक सोसाइटी है और केंद्र सरकार की योजनाओं एवं परियोजनाओं के तहत कार्य करती है

जस्टिस अनिश कुमार गुप्ता ने यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनाया, जिनमें DRDA में लंबे समय से काम कर रहे Data Entry Operator, Computer Operator और Programmer पदों पर कार्यरत लोगों ने नियमितीकरण और नियमित वेतनमान की मांग की थी।

2016 के नियम क्यों लागू नहीं होंगे?

कोर्ट ने 2016 के नियमों के Rule 2(3) का हवाला देते हुए कहा कि ये नियम राज्य सरकार की योजनाओं या केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों में consolidated pay या fixed honorarium पर लगाए गए व्यक्तियों पर लागू नहीं होते।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति DRDA द्वारा की गई थी, जो सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत है और केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत कार्य करती है। इसलिए उन्हें 2016 के नियमों के तहत नियमितीकरण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

DRDA पर 2015 का सरकारी आदेश भी लागू नहीं

याचिकाकर्ताओं ने 13 अगस्त 2015 और 9 दिसंबर 2021 के सरकारी आदेशों का भी हवाला दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि 2015 का आदेश सरकारी विभागों, स्वायत्त निकायों, सार्वजनिक उपक्रमों, स्थानीय निकायों और अन्य निर्दिष्ट संस्थाओं पर लागू होता है, DRDA पर नहीं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि उत्तराखंड में DRDA के समान कर्मचारियों को सरकार द्वारा absorb किए जाने का उदाहरण याचिकाकर्ताओं के लिए उत्तर प्रदेश में स्वतः कोई अधिकार पैदा नहीं करता।

पुराने आदेशों को चुनौती देने का अधिकार नहीं

याचिकाकर्ताओं ने 2009 और 2010 में पारित उन आदेशों को भी रद्द करने की मांग की थी, जिनमें समान कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे खारिज किए गए थे।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता उन मामलों के पक्षकार नहीं थे और न ही उनके अभ्यावेदन पर ये आदेश पारित हुए थे। इसलिए वे उन आदेशों को चुनौती देकर रद्द नहीं करा सकते।

हाईकोर्ट ने अंततः याचिकाएं खारिज कर दीं।

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