इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'विश्वसनीय जानकारी' के बिना पुलिस द्वारा गलत तरीके से गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को ₹1 लाख का मुआवजा दिया

Update: 2026-02-04 13:28 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ऐसे व्यक्ति को 1 लाख रुपये का मुआवजा दिया, जिसे 2017 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने बिना किसी उचित जांच या उसके खिलाफ विश्वसनीय सबूत के गलत तरीके से गिरफ्तार और हिरासत में लिया था।

जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की बेंच ने कहा कि गिरफ्तार करने वाले पुलिस कर्मियों की मनमानी और लापरवाही वाली कार्रवाई से याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है और वह उस कृत्य का एक असहाय शिकार था।

संक्षेप में मामला

याचिकाकर्ता (सुनील कंडू @ सुनील कुमार गुप्ता) ने 2017 में छेड़छाड़ और बलात्कार के प्रयास के मामले में अपनी गलत गिरफ्तारी के लिए मुआवजे की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

उसका कहना था कि उसकी हिरासत उसके मानवाधिकारों और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था, क्योंकि पुलिस अधिकारी ने आरोपों की पहली नज़र में संतुष्टि के बिना उसे गिरफ्तार किया।

30 मार्च, 2017 को शिकायतकर्ता ने FIR दर्ज कराई, जिसमें उसने आरोप लगाया कि अज्ञात व्यक्ति (कथित तौर पर याचिकाकर्ता) ने उसे मदद की पेशकश की, लेकिन बाद में उसने उसके साथ छेड़छाड़ की और बलात्कार करने की कोशिश की। उसने यह भी दावा किया कि उसकी चीखें सुनकर राहगीरों ने उसे बचाया।

इस FIR पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने घटना के दो हफ्ते से ज़्यादा समय बाद 17 अप्रैल, 2017 को याचिकाकर्ता को लखनऊ से गिरफ्तार किया। उसे जमानत मिलने से पहले 79 दिनों तक हिरासत में रखा गया।

इसके बाद जुलाई, 2022 में शिकायतकर्ता के बार-बार नोटिस के बावजूद संबंधित अदालत में पेश न होने के बाद आपराधिक मामला खत्म कर दिया गया।

इसके अलावा, जांच में भी यह सामने आया कि याचिकाकर्ता कथित घटना के दिन गोरखपुर में मौजूद ही नहीं था।

इस पृष्ठभूमि में याचिकाकर्ता ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 (a) (i) के तहत गलत गिरफ्तारी और हिरासत के लिए मुआवजे की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इस संबंध में उसने मानवाधिकार आयोग में भी याचिका दायर की थी।

बेंच को बताया गया कि संबंधित पुलिस कर्मियों के खिलाफ विभागीय जांच भी की गई और उक्त जांच में उन्हें दोषी पाया गया और उन्हें दंडित किया गया। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने यह तर्क दिया कि मानवाधिकार आयोग याचिकाकर्ता द्वारा दायर शिकायत पर विचार नहीं कर सकता, क्योंकि यह मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 36 में निर्धारित समय के बाद दायर की गई।

मामले के तथ्यों की जांच करने पर बेंच संतुष्ट थी कि पुलिस के पास विश्वसनीय जानकारी नहीं थी, इसलिए उसके पास यह मानने का कोई कारण नहीं था कि याचिकाकर्ता ने कथित अपराध किया।

बेंच ने अपने आदेश में कहा,

"रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है और न ही हमारे सामने ऐसा कुछ पेश किया गया, जिससे यह पता चले कि मिली जानकारी के आधार पर कोई जांच की गई हो, जिससे यह मानने का कारण हो कि याचिकाकर्ता ने उक्त अपराध किया।"

बेंच ने आगे कहा कि CrPC की धारा 41(1)(ba) (जो अब रद्द हो चुकी है लेकिन उस समय लागू थी) के तहत पुलिस अधिकारी बिना वारंट के तभी गिरफ्तार कर सकता है, जब "विश्वसनीय जानकारी" हो और अधिकारी के पास यह "मानने का कारण" हो कि उस व्यक्ति ने अपराध किया।

कोर्ट ने पुलिस के बयान में कई बड़ी कमियां भी देखीं, क्योंकि FIR और बयानों में आरोप लगाया गया कि हमलावर ने पीड़िता की गर्दन पकड़ी और उसके गाल पर काटा, जबकि पुलिस मेडिको लीगल रिपोर्ट में इन खास आरोपों की पुष्टि करने के लिए "चोट का कोई निशान" नहीं दिखा।

जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कोई गिरफ्तारी सिर्फ इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि पुलिस अधिकारी के लिए ऐसा करना कानूनी है और पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी को सही ठहराना होगा, न कि सिर्फ अपनी शक्ति के आधार पर।

बेंच ने टिप्पणी की,

“किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी और पुलिस लॉक-अप में हिरासत से उसकी इज्जत और आत्म-सम्मान को बहुत नुकसान हो सकता है। किसी व्यक्ति पर अपराध करने के सिर्फ आरोप के आधार पर रूटीन तरीके से गिरफ्तारी नहीं की जा सकती (2011) 14 SCC 481। एक पुलिस अधिकारी के लिए नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के हित में और शायद अपने खुद के हित में भी, यह समझदारी होगी कि किसी शिकायत की सच्चाई और ईमानदारी के बारे में कुछ जांच के बाद उचित संतुष्टि के बिना कोई गिरफ्तारी न की जाए और व्यक्ति की मिलीभगत और गिरफ्तारी की जरूरत दोनों के बारे में उचित विश्वास होना चाहिए। किसी व्यक्ति की आजादी छीनना एक गंभीर मामला है।”

इस तर्क के बारे में कि उसने मानवाधिकार आयोग से बेवजह देरी से संपर्क किया, बेंच ने कहा कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला 14 जुलाई, 2022 को निपटा दिया गया। उसके एक साल से भी कम समय बाद उसने आयोग से संपर्क किया।

इस प्रकार, यह मानते हुए कि उसकी गिरफ्तारी कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार नहीं थी, बेंच ने 1 लाख रुपये का मुआवजा देना उचित समझा।

Case title - Sunil Kandu @ Sunil Kumar Gupta vs. Secretary, Ministry Of Home Affairs And 2 Others 2026 LiveLaw (AB) 56

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