अनुच्छेद 226 के तहत आपराधिक कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक अदालत द्वारा पारित न्यायिक आदेश को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल कर चुनौती नहीं दी जा सकती।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक याचिका खारिज कर दी, जिसमें लखनऊ के स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (कस्टम) द्वारा फरवरी 2026 में पारित आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान राज्य ने याचिका की सुनवाई योग्य होने पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई और नीता सिंह बनाम राज्य, 2024 के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट, आपराधिक अदालतों के न्यायिक आदेशों के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिकाओं पर विचार नहीं कर सकता। राज्य ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में उचित उपाय केवल संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत ही उपलब्ध है।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता की ओर से राधे श्याम बनाम छबी नाथ, 2015 के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि यदि कोई अधीनस्थ अदालत अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य करती है, तो सर्टियोरारी रिट जारी की जा सकती है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस अंश पर याचिकाकर्ता ने भरोसा किया, वह वास्तव में टी.सी. बसप्पा बनाम टी. नागप्पा, 1954 मामले से संबंधित था, जिसे बाद के निर्णयों में स्वीकार नहीं किया गया।
कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने राधे श्याम मामले में कई बाद के फैसलों का उल्लेख करते हुए यह निष्कर्ष निकाला था कि सिविल अदालतों के न्यायिक आदेश अनुच्छेद 226 के तहत सर्टियोरारी रिट के दायरे में नहीं आते, और अनुच्छेद 227 के तहत क्षेत्राधिकार अलग और स्वतंत्र है।
इसके अलावा, नीता सिंह बनाम राज्य, 2024 के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक आदेशों की वैधता की जांच करने के लिए रिट याचिका सुनने से हाईकोर्ट “वंचित” हैं।
इसी आधार पर याचिका को प्रारंभिक चरण में ही अस्वीकार्य (नॉट मेंटेनेबल) बताते हुए खारिज कर दिया गया।
हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत नई याचिका दाखिल कर सकता है।