इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुजफ्फरनगर के एक हिस्ट्रीशीटर के लापता होने के मामले में CBI जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने स्थानीय पुलिस की जांच के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस की कार्रवाई में न तो गंभीरता दिखाई दे रही है और न ही लापता व्यक्ति का पता लगाने की वास्तविक कोशिश नजर आ रही है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। मामला मुत्तलिव पुत्र शराफत के लापता होने से जुड़ा है, जो 4 मई 2026 से गायब है।

मुत्तलिव पर करीब 30 आपराधिक मामले दर्ज

अदालत के सामने बताया गया कि मुत्तलिव को मुजफ्फरनगर जिले के विभिन्न थानों में दर्ज करीब 30 आपराधिक मामलों के कारण हिस्ट्रीशीटर बताया गया है।

याचिकाकर्ता और मुत्तलिव के भाई आलम के अनुसार, 4 मई को हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद रिहा होने के तुरंत बाद मुत्तलिव और उसके पिता को पुरकाजीपुर थाना पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। मुत्तलिव के पिता को 7 मई को छोड़ दिया गया, लेकिन इसके बाद से मुत्तलिव का कोई पता नहीं चला।

पुलिस का दावा- वारंट की तामील के लिए तलाश थी

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि मुत्तलिव की रिहाई के बाद पुलिस उसे 2012 के एक सेशन ट्रायल मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी वारंट की तामील के लिए तलाश कर रही थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने वारंट जारी होने और पुलिस को उसके प्राप्त होने की तारीखों को लेकर रिकॉर्ड में कई विसंगतियां पाईं। अदालत ने इन विसंगतियों का उल्लेख अपने 11 अगस्त 2026 के पहले के आदेश में भी किया था।

पुलिस ने बस स्टैंड और सरकारी दफ्तरों में लगाए पोस्टर

सुनवाई के दौरान पुरकाजीपुर थाने के SHO ने अदालत को बताया कि 15 अगस्त को मुत्तलिव की तलाश के लिए एक विशेष टीम गठित की गई थी।

पुलिस ने टीम द्वारा की गई कार्रवाई से संबंधित जनरल डायरी (GD) की प्रविष्टियां भी अदालत के सामने रखीं। इन रिकॉर्ड्स को देखने के बाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई को लेकर “कैजुअल और लापरवाह रवैये” पर नाराजगी जताई।

अदालत ने पाया कि पुलिस टीम विभिन्न सार्वजनिक स्थानों, जैसे बस स्टैंड और सरकारी कार्यालयों में जाकर मुत्तलिव की तस्वीर चिपका रही थी।

परिजनों और परिचितों से पूछताछ तक नहीं की गई

अदालत ने SHO से पूछा कि क्या मुत्तलिव के परिचितों के बयान दर्ज किए गए हैं? क्या 4 मई के बाद किसी व्यक्ति ने उसे देखा था?

पीठ ने यह भी पूछा कि क्या उसके भाई, अन्य रिश्तेदारों, पड़ोसियों, दोस्तों और सहयोगियों के बयान दर्ज किए गए हैं, ताकि उसके ठिकाने का पता लगाया जा सके।

अदालत के अनुसार, इन सवालों का जवाब “निराशाजनक रूप से नकारात्मक” था।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि पुलिस वास्तव में मुत्तलिव का पता लगाने के लिए गंभीर प्रयास नहीं कर रही थी, बल्कि मामले को अदालत के सामने लंबा खींचने की कोशिश करती नजर आ रही थी।

हाईकोर्ट ने जताई दो संभावनाएं

मुत्तलिव के आपराधिक इतिहास और उसके अचानक लापता होने की परिस्थितियों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि उसके गायब होने से दो संभावनाएं सामने आती हैं।

पहली संभावना यह कि उसके आपराधिक इतिहास के कारण पुलिस ने उसे मार डाला हो और उसके शव को कहीं दफना दिया गया हो।

दूसरी संभावना यह कि लंबे आपराधिक इतिहास वाला मुत्तलिव खुद न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए कहीं छिपा हुआ हो।

अदालत ने कहा कि दोनों ही परिस्थितियों में उसका पता लगाना “अत्यंत आवश्यक” है।

अगर वह मर चुका है तो उसके अवशेष बरामद किए जाने चाहिए और कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं अगर वह जीवित है तो उसे गिरफ्तार किया जाना चाहिए, ताकि वह न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए छिपा न रह सके।

स्थानीय पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं, CBI को सौंपी जांच

हाईकोर्ट ने कहा कि स्थानीय पुलिस या तो जांच करने में सक्षम नहीं है या फिर जानबूझकर कार्यवाही में देरी कर रही है, जिससे अदालत के सामने कार्यवाही को टाला जा रहा है।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने CBI को मुत्तलिव के लापता होने की जांच करने का निर्देश दिया।

CBI को स्थानीय पुलिस से केस डायरी लेने और मामले की जांच करने को कहा गया है।

पुलिस रिकॉर्ड में कथित हेरफेर पर भी सवाल

अदालत ने पुलिस रिकॉर्ड में वारंट की प्राप्ति और तामील से संबंधित कई विसंगतियों का भी उल्लेख किया।

विशेष रूप से, मुत्तलिव के खिलाफ कथित गैर-जमानती वारंट से संबंधित रिकॉर्ड में एक तारीख को खुरचकर बदले जाने की बात सामने आई।

SHO ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि रिकॉर्ड में यह खुरचना संबंधित कांस्टेबल द्वारा की गई थी। हालांकि, इसे उन्होंने “लापरवाही और अनजाने में हुई गलती” बताया।

जब अदालत ने पूछा कि इस मामले में संबंधित कांस्टेबल के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, क्या उसे निलंबित किया गया, क्या उसकी भूमिका की जानकारी SSP को दी गई और क्या यह पता लगाने के लिए जांच हुई कि रिकॉर्ड में बदलाव जानबूझकर किया गया था या गलती से—तो SHO इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

3 हफ्ते में CBI को देनी होगी प्रारंभिक रिपोर्ट

हाईकोर्ट ने CBI को निर्देश दिया है कि वह तीन सप्ताह के भीतर प्रारंभिक रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करे।

इसके साथ ही मुजफ्फरनगर के SSP को निर्देश दिया गया है कि CBI को निष्पक्ष और तटस्थ जांच के लिए जिला प्रशासन और पुलिस की ओर से आवश्यक हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाए।

मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 को होगी।

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