'जांच में गंभीर चूक': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग के रेप के मामले में 11 साल जेल में बिताने वाले व्यक्ति को बरी किया

Update: 2026-04-07 04:30 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में ऐसे व्यक्ति को बरी किया, जिसने 2010 के एक मामले में, जिसमें 14 साल की लड़की के साथ रेप का आरोप था, 11 साल जेल में बिताए। बेंच ने टिप्पणी की कि पुलिस ने एक "गंभीर चूक" की थी, क्योंकि वे पीड़िता के शरीर पर मिले मानव वीर्य (semen) का मिलान आरोपी से करने में नाकाम रहे थे।

जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस बृज राज सिंह की बेंच ने 2018 के उस ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता को IPC की धारा 376 के तहत आजीवन कारावास और 50,000 रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई गई।

बेंच ने व्यक्ति की तत्काल रिहाई का आदेश देते हुए कहा,

"आपराधिक मामलों में सबूतों के मानक को देखते हुए किसी भी व्यक्ति को केवल अंदाज़े या शक के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता और न ही उसे ऐसे अपराध का दोषी माना जा सकता है।"

अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, 20 सितंबर 2010 को आरोपी-अपीलकर्ता ने कथित तौर पर अपनी 14 साल की पड़ोसी को बहला-फुसलाकर उसके साथ रेप किया था। पीड़िता की 3 दिन बाद मौत हो गई। इसके बाद उसके पिता ने IPC की धारा 376, 302 और 506 के तहत FIR दर्ज कराई।

पूरी सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को हत्या और आपराधिक धमकी के आरोपों से बरी कर दिया, क्योंकि मौत के कारण के संबंध में सबूतों की कमी थी। हालांकि, कोर्ट ने उसे रेप के अपराध का दोषी ठहराया।

अपील में हाईकोर्ट ने पाया कि जहां फोरेंसिक रिपोर्ट ने योनि के स्वैब (vaginal swab) पर मानव वीर्य की मौजूदगी की पुष्टि की थी, वहीं यह साबित करने के लिए कोई और जांच नहीं की गई कि वह वीर्य अपीलकर्ता का ही था।

बेंच ने ट्रायल कोर्ट की इस प्रासंगिक पहलू को नज़रअंदाज़ करने के लिए आलोचना करते हुए टिप्पणी की,

"...यह तो कहा जा सकता है कि उसके साथ रेप हुआ, लेकिन फोरेंसिक रिपोर्ट इस बात का कोई सबूत नहीं है कि अपीलकर्ता निर्मल कुमार ने उसके साथ रेप किया, क्योंकि योनि के स्मीयर स्लाइड पर मिले मानव वीर्य के निर्मल कुमार का होने को साबित करने के लिए कोई और मेडिकल जांच आदि नहीं की गई।"

इस संबंध में बेंच ने यह भी टिप्पणी की कि DNA या वीर्य का मिलान न कर पाना "जांच की ओर से एक गंभीर चूक" थी। डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पीड़िता की मृत्यु से पहले उसकी बहन और अन्य ग्रामीणों को दिए गए बयानों पर भरोसा करने को भी खारिज किया।

हालांकि, राज्य सरकार ने यह तर्क दिया कि इन बयानों को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत 'डाइंग डिक्लेरेशन' (मृत्यु-पूर्व बयान) के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने यह पाया कि ऐसे बयान केवल उन्हीं मामलों में प्रासंगिक होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण सवालों के घेरे में हो। हालांकि, मौजूदा मामले में, जैसा कि ट्रायल कोर्ट ने भी पाया, अभियोजन पक्ष द्वारा ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि पीड़िता की मृत्यु या उसकी हत्या, अपीलकर्ता द्वारा किए गए बलात्कार का ही परिणाम थी।

इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि बलात्कार के आरोप को साबित करने के लिए ग्रामीणों को दिए गए पीड़िता के बयानों पर भरोसा करना "बहुत खतरनाक" होगा, खासकर तब जब ये बयान किसी पुलिस अधिकारी/मजिस्ट्रेट आदि के सामने दर्ज नहीं किए गए।

कोर्ट ने यह भी पाया कि अपराध का कोई प्रत्यक्ष चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं था।

बेंच ने इस प्रकार टिप्पणी की:

"हमारी समझ से बाहर है कि हमारे सामने मौजूद तथ्यों और सबूतों के आधार पर P.W.2 (सुमिता), P.W.3 (रामावती) और P.W.4 (श्रीमती निर्मला) के बयान IPC की धारा 376 के आरोप को साबित करने के लिए कैसे प्रासंगिक हो सकते हैं। इन्हें सहायक सबूत (corroborative evidence) के तौर पर कैसे माना जा सकता है, जबकि फॉरेंसिक सबूत केवल यौन संबंध या बलात्कार की ओर ही इशारा करते हैं, लेकिन यह साबित नहीं करते कि अपीलकर्ता निर्मल कुमार ने ही बलात्कार किया था..."

परिणामस्वरूप, इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि इस मामले में अपीलकर्ता को दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं था, हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की और अपीलकर्ता को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

Case title - Nirmal Kumar vs State of UP 2026 LiveLaw (AB) 187

Tags:    

Similar News