35 साल पुराने दहेज मृत्यु मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला, पति और ससुराल वाले बरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 35 साल पुराने दहेज मृत्यु मामले में पति और दो ससुराल वालों को बरी कर दिया। जस्टिस मनोज बाजाज की पीठ ने कहा कि धारा 304-B IPC के तहत दोषसिद्धि के लिए यह साबित करना जरूरी है कि महिला की मौत से 'जल्द पहले' उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था।
कोर्ट ने शिव नारायण उर्फ सूर्य नारायण, जय नारायण और पटेश्वर की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया।
क्या था मामला?
मृतका की शादी 12 मई 1987 को शिव नारायण से हुई थी। अभियोजन ने आरोप लगाया था कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था और एक मौके पर स्कूटर की मांग की गई थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि स्कूटर की कथित मांग का उल्लेख एफआईआर या जांच के दौरान दर्ज बयानों में नहीं था और यह आरोप पहली बार ट्रायल के दौरान माता-पिता की गवाही में सामने आया।
महिला सितंबर 1991 में लापता हुई और बाद में उसका शव ससुराल से करीब 115 कदम दूर एक कुएं से मिला।
कोर्ट ने कहा कि कथित स्कूटर की मांग नवंबर 1987 की थी, जबकि महिला की मौत सितंबर 1991 में हुई। यानी दोनों घटनाओं के बीच करीब चार साल का अंतर था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मृतका ने अपने जीवनकाल में दहेज उत्पीड़न की कोई शिकायत नहीं की थी।
धारा 113-B की कानूनी धारणा पर क्या कहा?
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Karan Singh v. State of Haryana फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 113-B के तहत दहेज मृत्यु की कानूनी धारणा तभी लागू हो सकती है, जब अभियोजन पहले यह साबित करे कि महिला को मौत से जल्द पहले दहेज के लिए क्रूरता या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था।
कोर्ट ने कहा कि जब यह मूल तथ्य ही साबित नहीं हुआ, तो धारा 113-B की कानूनी धारणा लागू नहीं हो सकती।
हत्या का आरोप भी साबित नहीं हुआ
अभियोजन ने महिला की हत्या कर शव कुएं में फेंकने का आरोप भी लगाया था। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि पोस्टमार्टम में मिली सिर की चोट कुएं में गिरने के दौरान भी लग सकती थी।
अभियोजन कथित हत्या की जगह, तरीका और शव को हत्या के बाद कुएं में फेंके जाने की बात साबित नहीं कर सका।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 302 IPC के तहत आरोप तय ही नहीं किए गए थे, फिर भी ट्रायल कोर्ट ने हत्या का निष्कर्ष निकाला, जिसे कोर्ट ने कानून की दृष्टि से गलत बताया।
अंततः हाईकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों में मौजूद विरोधाभासों को देखते हुए तीनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।